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असम-बंगाल के नतीजों ने बढ़ा दी सपा की टेंशन! बीजेपी का एजेंडा सेट, अब क्या करेंगे अखिलेश?

असम-बंगाल के नतीजों ने बढ़ा दी सपा की टेंशन! बीजेपी का एजेंडा सेट, अब क्या करेंगे अखिलेश?

TV9 UP 1 month ago

श्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु समेत पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने उत्तर प्रदेश के सियासी तापमान को बढ़ा दिया है. खास तौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए ये नतीजे एक बड़े 'वेक-अप कॉल' की तरह माने जा रहे हैं.

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन और असम में भाजपा की लगातार तीसरी जीत ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी का चुनावी मॉडल अभी भी प्रभावी है. हिंदुत्व, विकास और महिला केंद्रित योजनाओं का जो कॉकटेल, भाजपा पिछले कुछ वर्षों से अपनाती आ रही है, वह अलग-अलग राज्यों में काम करता दिख रहा है.

असम के नतीजों से भाजपा को यह भरोसा मिला है कि उसका ‘रिपीट फॉर्मूला’ 2027 के यूपी चुनाव में भी कारगर हो सकता है. उत्तर प्रदेश में भाजपा अब और ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ उतरने की तैयारी में दिख रही है. पार्टी का फोकस चार मुद्दों पर रहने की संभावना है- 1. विकास, 2. कानून-व्यवस्था, 3. महिला सशक्तिकरण और 4. हिंदुत्व.
राम मंदिर, एक्सप्रेसवे, डिफेंस कॉरिडोर, धार्मिक पर्यटन जैसे प्रोजेक्ट्स को ‘विकास + सांस्कृतिक पहचान’ के साथ जोड़कर पेश किया जाएगा. इसके साथ ही महिलाओं को साधने के लिए बड़े स्तर पर योजनाओं का ऐलान हो सकता है.

स्थानीय निकायों में 50% आरक्षण का ऐलान कर सकती है भाजपा

सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय निकाय चुनावों में 50% महिला आरक्षण लागू करने या इसका व्यापक प्रचार करने की रणनीति पर फिर से मंथन हो सकता है. इसके जरिए भाजपा यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि वह महिलाओं के राजनीतिक और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है. पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल (सोमवार) को कहा था, ‘जैसे टीएमसी और डीएमके ने महिला आरक्षण का विरोध किया और उन्हें महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ा.. ठीक ऐसे ही सपा को भी महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा.’

महिलाओं को जो साधेगा, वह यूपी चुनाव जीतेगा

महिला मतदाता निर्णायक भूमिका में आ चुकी हैं. पिछले कुछ चुनावों में यह ट्रेंड साफ दिखा है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में महिला-केंद्रित योजनाओं का सीधा असर चुनावी नतीजों में दिखाई दिया. बीजेपी ने अलग-अलग राज्यों में नकद सहायता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के जरिए महिलाओं के बीच मजबूत पकड़ बनाई है. अब यही मॉडल यूपी में और बड़े पैमाने पर लागू करने की तैयारी हो सकती है. अगर पार्टी यूपी में भी कोई बड़ी ‘डायरेक्ट कैश ट्रांसफर’ या सामाजिक सुरक्षा योजना लेकर आती है, तो यह चुनावी समीकरण बदल सकती है.

सपा-कांग्रेस गठबंधन की मुश्किलें

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों का गठबंधन सफल रहा था, लेकिन विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ सकता है. कांग्रेस जहां 100 से ज्यादा सीटों की मांग कर रही है, वहीं सपा अपने कोर वोट बैंक और संगठनात्मक ताकत के आधार पर 50 से कम सीटें देने के पक्ष में दिख रही है. अगर यह खींचतान बढ़ती है, तो गठबंधन की मजबूती पर असर पड़ सकता है. अगर दोनों की राहें जुदा होती हैं तो इसका असर मुस्लिम वोटों के बिखराव के रूप में देखने को मिल सकता है. जैसे बंगाल में हुआ.

जातीय समीकरण बनाम नई सोशल इंजीनियरिंग

उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों पर टिकी रही है. सपा का पारंपरिक यादव-मुस्लिम (MY) वोट बैंक मजबूत माना जाता है, लेकिन भाजपा ने पिछले कुछ चुनावों में नॉन-यादव ओबीसी और दलित वोटों में सेंध लगाकर समीकरण बदल दिए हैं. हालांकि, लोकसभा चुनाव में सपा ने नॉन-यादव ओबीसी और दलित वोटों में सेंध लगाकर बीजेपी को पटखनी दी थी. अब बीजेपी की कोशिश है कि वह गैर-यादव ओबीसी और महिला मतदाताओं के जरिए अपनी बढ़त बनाए रखे, जबकि सपा ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और मजबूत करने में जुटी है.

‘तुष्टिकरण’ बनाम ‘समावेशन’ की बहस

बंगाल के नतीजों के बाद एक बड़ा नैरेटिव यह भी उभरा है कि ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ अब उतनी प्रभावी नहीं रही. बीजेपी इस मुद्दे को यूपी में और आक्रामक तरीके से उठाने की तैयारी में है. सपा पर पहले से ही ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में 2027 के चुनाव में भाजपा इस मुद्दे को और तेज कर सकती है. यह सपा के लिए चुनौती होगी कि वह अपने अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखते हुए ‘सर्वसमाज’ की छवि कैसे मजबूत करे. हालांकि, बीते दिनों में अखिलेश ने अपनी छवि बदलने की बहुत कोशिश की है. कन्नौज में शिव मंदिर का निर्माण इसी कड़ी का हिस्सा है.

‘सनातन’ बनाम ‘विकास’ का नैरेटिव

तमिलनाडु की राजनीति में ‘सनातन’ को लेकर हुई बयानबाजी का असर भी राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिला. भाजपा इस मुद्दे को उत्तर भारत में भुनाने की कोशिश कर सकती है. अखिलेश यादव हाल के समय में अपनी छवि को ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके सामने चुनौती यह होगी कि वह भाजपा के ‘हार्ड हिंदुत्व’ के नैरेटिव का मुकाबला कैसे करते हैं, बिना अपने पारंपरिक वोट बैंक को नाराज़ किए. अखिलेश की पूरी कोशिश है कि वह 2012 से 2017 के बीच हुए विकास कार्यों के जरिए वोट मांगे, लेकिन बीजेपी उन्हें सनातन विरोधी साबित करने से चूक न रही है.

क्या अखिलेश के लिए खतरे की घंटी?

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार ने विपक्षी दलों के लिए एक चेतावनी जरूर दी है. इससे यह संदेश गया है कि सिर्फ संगठन या पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते. अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने ‘पीडीए’ फॉर्मूले को जमीन पर कितना प्रभावी बना पाते हैं और क्या वह महिला मतदाताओं, युवाओं और गैर-यादव ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत कर पाते हैं. भाजपा जहां अपने स्थापित मॉडल को और आक्रामक तरीके से लागू करने की तैयारी में है, वहीं सपा को अपनी रणनीति में नए प्रयोग करने होंगे.

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: TV9 UP