संयुक्त राष्ट्र की कई सबसे बड़ी सफलताएँ वे संकट हैं, जो कभी सुर्ख़ियों में नहीं आते.
दुनिया भर में विशेष राजनैतिक मिशन, चुपचाप तनाव कम करने, समझौते कराने और नाज़ुक राजनैतिक बदलावों में सहयोग देने का काम करते हैं.
बातचीत, मध्यस्थता और कूटनीति ही उनके मुख्य साधन हैं.
शान्तिरक्षा मिशनों के विपरीत, जो अक्सर अधिक दिखाई देते हैं, इन मिशनों के पास न तो बख़्तरबंद वाहन होते हैं और न ही सशस्त्र सैनिक.
इन मिशनों की पहली व्यापक समीक्षा जारी होने के अवसर पर, राजनैतिक और शान्तिनिर्माण मामलों के लिए संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव रोज़मैरी डीकार्लो ने इनके काम को "कभी साधारण, तो कभी ऐतिहासिक" बताया. उन्होंने कहा कि यह "एक चिरस्थाई सत्य की ओर इशारा करता है - वो ये कि "कूटनीति प्रभावी है और काम करती है." यह सीख आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है.
यह समीक्षा 1948 से 2025 तक की अवधि का लेखा-जोखा पेश करती है और दिखाती है कि बदलती दुनिया के साथ संयुक्त राष्ट्र की राजनैतिक भूमिका किस तरह विकसित हुई है.
फ़लस्तीन से वर्तमान तक
ऐसा पहला मिशन संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लगभग तुरन्त बाद, मई 1948 में स्थापित किया गया था.
© UN Photoद्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ़लस्तीनियों को संयुक्त राष्ट्र से सहायता मिली.स्वीडन के राजनयिक काउंट फ़ोल्के बेर्नाडोट को फ़लस्तीन में संयुक्त राष्ट्र मध्यस्थ नियुक्त किया गया. यह पहली बार था जब संयुक्त राष्ट्र ने किसी सशस्त्र टकराव को सुलझाने में मदद के लिए एक विशेष दूत तैनात किया.
आज, विशेष राजनैतिक मिशन कई तरह की भूमिकाएँ निभाते हैं. ये असैन्य मिशन होते हैं, जिनका दायित्व होता है -
- हिंसक टकरावों की रोकथाम
- शान्ति प्रक्रियाओं को समर्थन
- टिकाऊ शान्ति के निर्माण में मदद
कुछ मिशन शान्ति वार्ताओं को आगे बढ़ाते हैं, तो कुछ युद्धविराम समझौतों की निगरानी करते हैं. कुछ मिशन सीमाओं के निर्धारण में मदद करते हैं, गम्भीर उल्लंघनों की जाँच करते हैं या राजनैतिक सुधार प्रक्रियाओं को समर्थन देते हैं.
रोज़मैरी डीकार्लो के अनुसार, विशेष राजनैतिक मिशनों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विविधता है.
उन्होंने कहा, "इन मिशनों ने महासचिव के दूतों, तथ्य-जाँच और जाँच-पड़ताल मिशनों, क्षेत्रीय कार्यालयों, सुरक्षा परिषद को प्रतिबन्ध व्यवस्थाओं की निगरानी में मदद देने वाले विशेषज्ञ पैनलों, और जटिल राजनैतिक बदलावों में सहयोग देने वाले मिशनों का रूप लिया है."
उन्होंने कहा, "लचीलापन हमेशा से इन मिशनों की ताक़त रहा है. वही साधन, जिसने युद्धविराम कराने में मदद की, सीमा निर्धारण में भी सहयोग दे सकता है या रासायनिक हथियार कार्यक्रम को समाप्त करने में मदद कर सकता है. बहुत कम बहुपक्षीय साधन इतने अनुकूलनीय होते हैं."
देशों को स्वतंत्र राष्ट्र बनने में मदद
शुरुआती दौर के सबसे उल्लेखनीय उदाहरणों में लीबिया की स्वतंत्रता में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका है.
1940 के दशक के अन्त तक, लीबिया विभाजित था और अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के तहत चल रहा था. यह देश 1911 से 1942 तक इटली का उपनिवेश रहा था और उससे पहले ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था.
© UN Photo/SMलीबिया में संयुक्त राष्ट्र मिशन ने तकनीकी सहायता परियोजनाओं की एक व्यापक श्रृँखला के ज़रिए लीबिया की स्वतंत्रता में सहयोग दिया.संयुक्त राष्ट्र के एक आयोग ने राजनैतिक मतभेदों को दूर करने, संविधान का मसौदा तैयार करने, अस्थाई सरकार स्थापित करने, एकीकृत वित्तीय व्यवस्था बनाने और सिविल सेवकों को प्रशिक्षण देने में मदद की.
केवल दो वर्ष बाद, लीबिया संयुक्त राष्ट्र समर्थित प्रक्रिया के ज़रिए स्वतंत्रता हासिल करने वाला पहला देश बन गया.
इसी तरह के मिशनों ने अन्य स्थानों पर भी उपनिवेशवाद से मुक्ति की प्रक्रियाओं में सहयोग दिया.
संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधियों ने कैमरून, इक्वेटोरियल गिनी और टोगोलैंड में जनमत-संग्रह आयोजित कराए, बहरीन के लोगों से परामर्श किया और नव-स्वतंत्र देशों को अपने संस्थान बनाने में मदद दी.
शीत युद्ध के दौरान कूटनीति
शीत युद्ध के दौरान, महाशक्तियों की प्रतिद्वन्द्विता के कारण सुरक्षा परिषद की कार्रवाई करने की क्षमता अक्सर सीमित हो जाती थी. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने महासचिव के विशेष प्रतिनिधियों पर अधिक भरोसा करना शुरू किया.
1980 के दशक में, महासचिव के निजी प्रतिनिधि ने अफ़ग़ानिस्तान पर वर्षों तक चली वार्ताओं का नेतृत्व किया, जिनका परिणाम 1988 में जिनीवा समझौतों पर हस्ताक्षर के रूप में सामने आया.
लगभग इसी अवधि में, एक अन्य विशेष प्रतिनिधि ने ईरान और इराक़ के बीच वार्ताएँ जारी रखने में मदद की.
रोज़मैरी डीकार्लो के अनुसार, यह इतिहास वर्तमान के लिए भी एक अहम सन्देश देता है. उन्होंने कहा, "भू-राजनैतिक मतभेद कार्रवाई न करने का बहाना नहीं हो सकते." उन्होंने याद दिलाया कि विशेष राजनैतिक मिशन पूरे शीत युद्ध के दौरान सक्रिय रहे और फिर भी सफलताएँ हासिल कीं.
शीत युद्ध के बाद नई चुनौतियाँ
द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अन्त के बाद वे तनाव खुलकर सामने आए, जो लम्बे समय से दबे हुए थे. इसी के साथ राजनैतिक मिशनों की संख्या तेज़ी से बढ़ी.
© UN Photo/EW/Bपूर्व फ़्रांसीसी टोगोलैंड में मतदाता 1958 में नए प्रतिनिधि सदन के चुनाव का जश्न मनाते हुए.1990 के दशक के बाद से, इन मिशनों ने देशों को चुनाव आयोजित करने, नए संविधान तैयार करने, सरकारी संस्थानों में सुधार करने और गृहयुद्धों के बाद भरोसा फिर से बहाल करने में मदद दी.
ताजिकिस्तान में एक उल्लेखनीय सफलता मिली, जहाँ संयुक्त राष्ट्र के एक राजनैतिक मिशन ने 1997 के शान्ति समझौते को लागू करने में सहयोग दिया और देश को गृहयुद्ध से शान्ति की ओर बढ़ने में मदद की.
© SESG for the Great Lake regionग्रेट लेक क्षेत्र के लिए विशेष दूत हुआंग शिया, 2019 में डीआर काँगो की यात्रा के दौरान.संयुक्त राष्ट्र के राजनैतिक मिशनों ने ऐल सैल्वाडोर, ग्वाटेमाला, बुरुंडी, सोमालिया, नेपाल, अंगोला, हेती और कई अन्य देशों में काम किया. इसी दौरान, सुरक्षा परिषद के प्रतिबन्धों के अनुपालन की निगरानी के लिए विशेषज्ञ पैनल भी स्थापित किए गए.
हेती और आज के नाज़ुक बदलाव
हेती दिखाता है कि विशेष राजनैतिक मिशन समय के साथ किस तरह बदल रहे हैं. शान्ति समझौते लागू कराने वाले मिशनों से अलग, हेती में संयुक्त राष्ट्र एकीकृत कार्यालय, BINUH, समावेशी राजनैतिक संवाद को बढ़ावा दे रहा है. यह वर्षों से राष्ट्रीय चुनाव न होने के बाद चुनावों की तैयारी में मदद कर रहा है और असुरक्षा व संस्थागत कमज़ोरी से जूझ रहे देश में अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों के समन्वय में सहयोग दे रहा है.
हेती के लिए महासचिव के विशेष प्रतिनिधि और BINUH के प्रमुख कार्लोस रुइज़ मासियू ने कहा कि इस मिशन का काम एक बुनियादी तत्व पर निर्भर करता है - वो है भरोसा.
उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र पर भरोसा है." उन्होंने कहा कि विशेष राजनैतिक मिशनों पर भी यह विश्वास है कि वे "परिणाम दे सकते हैं." उन्होंने कहा कि इस भरोसे को पहचानने, सँजोने और मज़बूत करने की आवश्यकता है.
सुर्ख़ियों से दूर
2025 के अन्त तक, संयुक्त राष्ट्र के 40 विशेष राजनैतिक मिशन दुनिया भर में काम कर रहे थे. आज, इनका ध्यान स्पष्ट राजनैतिक कार्यों पर केन्द्रित है - हिंसक टकरावों की रोकथाम, मध्यस्थता, क्षेत्रीय कूटनीति और अलग-अलग परिस्थितियों के अनुरूप शान्ति प्रक्रियाओं को समर्थन.
इनका काम अक्सर जानबूझकर पर्दे के पीछे होता है. ये मिशन ख़ामोश कूटनीति, गोपनीय सम्पर्कों और सरकारों, संघर्षरत पक्षों, क्षेत्रीय संगठनों व नागरिक समाज के साथ धैर्यपूर्ण संवाद के ज़रिए काम करते हैं.
स्वतंत्र प्रकाशन 'सुरक्षा परिषद रिपोर्ट' से शमाला कंडैया थॉम्पसन ने कहा कि ये मिशन हिंसक टकरावों को रोकने और राजनैतिक संवाद को आगे बढ़ाने में चुपचाप एक बेहद ज़रूरी भूमिका निभा रहे हैं. उनके अनुसार, ये मिशन शान्तिरक्षा अभियानों की तरह दिखाई भले ही न दें, लेकिन उनका महत्व किसी भी तरह कम नहीं है.
भविष्य की ओर देखते हुए, रोज़मैरी डीकार्लो ने कहा कि यह प्रकाशन केवल अतीत का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि क्या सम्भव है.
उन्होंने कहा, "सबसे कठिन परिस्थितियों में भी, संवाद दरवाज़े खोल सकता है, धैर्य भरोसा बना सकता है और कूटनीति इतिहास की दिशा बदल सकती है."

