यूएन समिति ने ध्यान दिलाया है कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति का विवाह, बाल विवाह की श्रेणी में आता है और यह एक हानिकारक प्रथा है.
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स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में विवाह के लिए स्वतंत्र तौर से, पूर्ण और जानकारी आधारित सहमति देने की स्वाभाविक क्षमता नहीं होती है, और इसलिए बाल विवाह, जबरन विवाह का ही एक रूप माना जाता है.
सत्तारूढ़ तालेबान द्वारा कुछ सप्ताह पहले जारी किए गए आधिकारिक आदेश संख्या 18 के अन्तर्गत, यौवनावस्था (puberty) प्राप्त कर चुकी विवाहित लड़कियों को एक अलग श्रेणी में रखा गया है, और यौवनावस्था को विवाह के लिए आधार मानते हुए बाल विवाह को वैधता प्रदान की गई है.
फ़रमान में यह भी कहा गया है कि यौवनावस्था प्राप्त करने के बाद लड़की की चुप्पी को विवाह के लिए उसकी सहमति माना जा सकता है.
अगस्त 2021 में सत्ता पर तालेबान की वापसी के बाद से ही, अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों पर असर डालने वाले क़दम उठाए गए हैं.
लड़कियों की माध्यमिक व उच्चतर शिक्षा पर प्रतिबन्ध है, सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी सीमित कर दी गई है, महिलाओं के कामकाज पर पाबन्दियाँ थोपी गई हैं और लाखों अफ़ग़ान महिलाएँ व लड़कियाँ शिक्षा के अधिकार से वंचित हो गई हैं.
एक हानिकारक प्रथा
यूएन बाल अधिकार समिति ने कहा है कि "यौवनावस्था को वयस्क होने या विवाह के लिए क़ानूनी क्षमता का आधार नहीं माना जा सकता है." साथ ही, इस प्रावधान को बाल अधिकार सन्धि के साथ पूरी तरह असंगत बताया है.
"बाल विवाह केवल एक हानिकारक प्रथा नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों का बुनियादी उल्लंघन है. इससे लड़कियाँ हिंसा, शोषण, कम उम्र में और जबरन गर्भधारण, शिक्षा में व्यवधान तथा दीर्घकालिक शारीरिक व मानसिक क्षति के जोखिमों का सामना करती हैं."
समिति ने चेतावनी दी है कि बाल विवाह को सामान्य बनाने या उसे बढ़ावा देने वाला कोई भी क़ानूनी ढाँचा, बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है, उनकी अन्तर्निहित गरिमा को कमज़ोर करता है और उन्हें स्वायत्तता तथा भावी अवसरों से वंचित करता है.
बुनियादी अधिकारों से वंचित
© UN Women/Sayed Habib Bidellमहिला सशक्तिकरण के लिए यूएन संस्था द्वारा समर्थित एक पहल के तहत, पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के नूरिस्तान प्रान्त में महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाया जा रहा है.18 स्वतंत्र बाल अधिकार विशेषज्ञों से गठित इस समिति ने गम्भीर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि यह फ़रमान तालेबान द्वारा उठाए गए भेदभावपूर्ण क़दमों की एक व्यापक श्रृंखला का हिस्सा है, जिनमें लड़कियों की माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा पर लगाए गए प्रतिबन्ध भी शामिल है.
विशेषज्ञों ने कहा कि, "इन उपायों ने अफ़ग़ानिस्तान की लाखों लड़कियों को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया है, उनकी भविष्य की आर्थिक और सामाजिक भागीदारी को कमज़ोर किया है, और पूरे देश में ग़रीबी व असमानता को और गहरा किया है."
समिति ने अफ़ग़ानिस्तान के तथ्यत: प्रशासन (de facto) से बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाले सभी आदेशों को तत्काल निरस्त करने, बाल विवाह पर स्पष्ट रूप से प्रतिबन्ध लगाने तथा सभी लड़कियों के शिक्षा, संरक्षण, समानता और समाज में पूर्ण भागेदारी के अधिकारों को बहाल करने की अपील की है.

