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अपना सोना, अपनी तिजोरी! विदेशों से वापस आया भारत का सैकड़ों टन गोल्ड, आखिर क्यों डर गया RBI?

अपना सोना, अपनी तिजोरी! विदेशों से वापस आया भारत का सैकड़ों टन गोल्ड, आखिर क्यों डर गया RBI?

UPUK Live 1 week ago

ब बात हमारी और आपकी जीवनभर की गाढ़ी कमाई की होती है, तो हम उसे सबसे सुरक्षित जगह पर रखना चाहते हैं। ठीक यही काम इस वक्त हमारा देश कर रहा है। दशकों से दुनिया भर के देशों का सोना लंदन और न्यूयॉर्क के बड़े-बड़े बैंकों की तिजोरियों में सुरक्षित माना जाता था, लेकिन अब हवा का रुख बदल रहा है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बहुत तेजी से विदेशों में रखा अपना सोना वापस देश ला रहा है। यह सिर्फ एक वित्तीय कदम नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक हालात में अपनी अर्थव्यवस्था को किसी भी बाहरी झटके से बचाने की एक बड़ी रणनीति है। देश का खजाना अब अपने ही घर में सुरक्षित किया जा रहा है, ताकि दुनिया में अगर कोई आर्थिक या राजनीतिक भूचाल आए, तो हमारी बुनियाद मजबूत रहे।

तिजोरियां बदलने की असली वजह क्या है?

रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों (अक्टूबर 2025 से मार्च 2026 की छमाही रिपोर्ट) पर नजर डालें तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। भारत के पास इस वक्त कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है। इसका लगभग 77 फीसदी हिस्सा यानी करीब 680 टन अब देश के भीतर ही सुरक्षित रखा गया है। वहीं 197.67 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के पास है, जबकि 2.8 टन जमा के रूप में है।

यह बदलाव कितनी तेजी से हुआ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज छह महीने के भीतर 104.23 टन सोना देश वापस लाया गया है। याद रहे, मार्च 2023 तक हमारा केवल 37 प्रतिशत सोना ही देश में था। यह रफ्तार बताती है कि भारत अब किसी भी तरह के बाहरी जोखिम को हल्के में नहीं ले रहा है और अपनी संपत्ति पर खुद का नियंत्रण चाहता है।

विदेशी संपत्तियों पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?

दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध और उसके बाद पश्चिमी देशों (G7) द्वारा अफगानिस्तान और रूस के रिजर्व फंड पर रोक लगाने जैसी घटनाओं ने पूरी दुनिया के केंद्रीय बैंकों की नींद उड़ा दी है। दुनिया को यह समझ आ गया है कि दूसरे देशों में रखी संप्रभु संपत्ति पूरी तरह से राजनीतिक फैसलों से सुरक्षित नहीं है। जानकारों के मुताबिक, आज के अस्थिर वैश्विक मौद्रिक तंत्र में अगर सोना आपके सीधे कब्जे में नहीं है, तो संकट के समय वह आपके काम नहीं आएगा।

भारत का यह कदम एक तरह का 'स्ट्रैटेजिक इंश्योरेंस' है। संकट के समय नकदी (लिक्विडिटी) की जरूरत पड़ने पर यह तभी काम आएगा जब यह हमारी अपनी पहुंच में होगा। यही वजह है कि 691.1 अरब डॉलर के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट के बावजूद, भारत के भंडार में सोने की हिस्सेदारी 13.9 प्रतिशत से बढ़कर 16.7 प्रतिशत हो गई है।

सिर्फ भारत नहीं, पूरी दुनिया में मची है होड़

ऐतिहासिक रूप से लंदन और न्यूयॉर्क सोने के व्यापार के सबसे बड़े केंद्र रहे हैं, जहां सोना भौतिक रूप से हिलाए बिना भी लेन-देन हो जाता है। फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के पास ही 5 लाख से ज्यादा सोने की ईंटें हैं और बैंक ऑफ इंग्लैंड 60 से ज्यादा देशों के लिए हब का काम करता है। लेकिन अब कई देश अपनी रणनीति बदल रहे हैं:

  • फ्रांस: बैंक ऑफ फ्रांस ने हाल ही में अपना 129 टन सोना न्यूयॉर्क से पेरिस शिफ्ट किया है, जिससे उसे 12.8 अरब यूरो का फायदा भी हुआ।
  • जर्मनी: दुनिया के सबसे बड़े सोने के भंडार वाले देशों में से एक जर्मनी (3,352 टन) ने 2014 से 2017 के बीच 300 टन सोना वापस मंगाया था। हालांकि इसका एक बड़ा हिस्सा अब भी न्यूयॉर्क में है, जिसे लेकर वहां के नेता चिंता जता रहे हैं।
  • पोलैंड और चेक रिपब्लिक: पोलैंड इसे 'राष्ट्रीय स्वायत्तता' का नाम दे रहा है और अपना गोल्ड वापस ला रहा है। वहीं चेक रिपब्लिक जैसे देश अब भी लेन-देन की लागत बचाने के लिए विदेशी बैंकों पर भरोसा कर रहे हैं।
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