नेपाल की राजनीति में इन दिनों एक नई लहर देखने को मिल रही है। काठमांडू की सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी विदेश नीति को लेकर जो रुख अपनाया है, उसने न केवल बीजिंग बल्कि दिल्ली के गलियारों में भी चर्चा छेड़ दी है।
खबर है कि बालेन शाह ने अपनी कुर्सी के शुरुआती 100 दिनों के भीतर किसी भी विदेश यात्रा पर न जाने का कड़ा फैसला लिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि जून के आखिर तक बालेन शाह न तो भारत के दौरे पर आएंगे और न ही चीन की सरजमीं पर कदम रखेंगे।
दरअसल, बालेन शाह का पूरा ध्यान इस वक्त "पहले घर ठीक करने" पर है। नेपाली प्रधानमंत्री सचिवालय और विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए पहले तीन महीनों का एक सख्त लक्ष्य रखा है। काठमांडू से आ रही खबरों के मुताबिक, प्रधानमंत्री का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मुलाकातों से ज्यादा जरूरी देश के भीतर ठोस नतीजे देना है। ऐसे में भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के दौरे फिलहाल उनकी प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक गए हैं।
दिल्ली जाने से पहले बालेन की '60 शर्तें'
भले ही भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन शाह को उनके शपथ ग्रहण वाले दिन (27 मार्च) ही दिल्ली आने का न्योता दे दिया था, लेकिन इस बार नेपाल का रुख पहले जैसा नहीं है। बताया जा रहा है कि बालेन शाह ने भारत दौरे के लिए लगभग 50 से 60 मुद्दों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार की है। इसे कूटनीतिक हलकों में बालेन की 'शर्तों' के तौर पर देखा जा रहा है। असल में, वह पुराने प्रधानमंत्रियों की तरह केवल औपचारिक दौरों के पक्ष में नहीं हैं।
बालेन शाह का इरादा लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और नेपाल के संशोधित राजनीतिक नक्शे जैसे विवादित और संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात करने का है। उन्होंने अपने विदेश मंत्री खनाल को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पिछली सभी द्विपक्षीय उपलब्धियों और अनसुलझे मुद्दों का गहराई से अध्ययन किया जाए और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए उनके समाधान खोजे जाएं।
बजट और घरेलू चुनौतियां बनीं 'रुकावट'
नेपाल के प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, बालेन शाह की तत्काल विदेश यात्रा न होने के पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं। सरकार के सामने इस वक्त भूमिहीन लोगों की समस्याओं को हल करने जैसी बड़ी घरेलू जिम्मेदारी है। इसके अलावा, 29 मई को पेश होने वाले राष्ट्रीय बजट की तैयारियां भी जोरों पर हैं। प्रधानमंत्री के एक करीबी सहयोगी का कहना है कि "जब घर में बजट और जनता की उम्मीदों का अंबार लगा हो, तो विदेश यात्रा करना फिलहाल मुश्किल है।"
नेपाली कैलेंडर के हिसाब से देखें तो आषाढ़ महीने (जून-जुलाई) से पहले किसी बड़े दौरे की संभावना कम ही नजर आती है। जेष्ठ महीने में भी किसी आधिकारिक कार्यक्रम के तय होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं।
भारत-नेपाल संबंधों में कूटनीतिक हलचल तेज
भले ही बालेन शाह की यात्रा में देरी हो, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर बातचीत थमी नहीं है। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी के 11 मई को दो दिवसीय काठमांडू दौरे की उम्मीद जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि मिसरी की इस यात्रा के दौरान बालेन शाह द्वारा तैयार किए गए एजेंडे के कई बिंदुओं पर चर्चा हो सकती है। मिसरी के दौरे के बाद नेपाल के विदेश मंत्री खनाल भी भारत की यात्रा कर सकते हैं, जिससे दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की भविष्य में होने वाली मुलाकात की जमीन तैयार होगी।
फिलहाल, नेपाल का विदेश मंत्रालय अंतर-मंत्रालयी परामर्शों के जरिए पुराने समझौतों और प्राथमिकताओं की समीक्षा कर रहा है। बालेन शाह की यह रणनीति साफ संकेत देती है कि आने वाले समय में नेपाल-भारत संबंधों में एक नया और बराबरी का अध्याय देखने को मिल सकता है, जहां दोस्ती के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं होगा।

