पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। 21वीं सदी के इस सबसे बड़े ऊर्जा संकट ने बड़े-बड़े विकसित देशों की कमर तोड़ दी है और वे ईंधन की किल्लत से जूझ रहे हैं।
लेकिन, इन मुश्किल हालातों में भारत न केवल खड़ा रहा, बल्कि मजबूती के साथ आगे भी बढ़ा। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस संकट के समय भारत की इच्छाशक्ति और कूटनीति (डिप्लोमेसी) का लोहा मनवाया है।
कैसे बचा भारत? पीएम मोदी ने बताई अंदर की बात
पीएम मोदी ने बताया कि जब दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की हाहाकार मची थी, तब भारत ने सही समय पर सही फैसले लिए। पीएम ने उन लोगों पर भी निशाना साधा जो उस समय अफवाहें फैलाने में जुटे थे। उन्होंने साफ कहा कि भले ही दूर-दराज के इलाकों में सप्लाई में थोड़ी दिक्कतें आईं, लेकिन हमने देश में कहीं भी ईंधन की किल्लत पैदा नहीं होने दी।
इस दौरान तेल कंपनियों को अप्रैल से जून के बीच करीब 75,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इतनी बड़ी रकम में एक नई रिफाइनरी खड़ी की जा सकती थी, लेकिन सरकार ने इस बोझ को जनता पर नहीं पड़ने दिया। इसके अलावा, एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर आम आदमी को बड़ी राहत दी गई।
डिप्लोमेसी का ऐसा 'जादू', बढ़ गई ईंधन की सप्लाई
पीएम मोदी ने बताया कि इस संकट के दौर में भारत की दोस्ती दुनिया भर में काम आई। युद्ध से पहले भारत महज 25-26 देशों से तेल का आयात करता था, लेकिन संकट के समय भारत ने अपनी डिप्लोमैटिक पावर का जबरदस्त इस्तेमाल किया। आज भारत 40 से अधिक देशों से ईंधन मंगा रहा है। पीएम ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए 'राष्ट्र हित' और 'नागरिकों का हित' सबसे ऊपर है। 'नागरिक देवो भव' के मंत्र पर चलते हुए सरकार ने काम किया।
'सिर्फ शिलान्यास नहीं, पूरा भी करते हैं'
राजस्थान की धरती से पीएम ने अपने आलोचकों को भी कड़ा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार सिर्फ परियोजनाओं का शिलान्यास करके नहीं छोड़ती, बल्कि उन्हें समय पर पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर देती है। आत्मनिर्भर भारत का जिक्र करते हुए पीएम ने कहा कि देश का स्वाभिमान तभी ऊपर रह सकता है जब वह आत्मनिर्भर हो और दूसरे देशों पर निर्भरता कम हो। राजस्थान की धरती से आज विकसित और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया गया है।

