इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें इन दिनों लगातार आग उगल रही हैं। अमेरिका से लेकर भारत तक, कच्चा तेल अपनी ताकत का अहसास करा रहा है और ग्लोबल मार्केट को साफ संदेश दे रहा है कि मौजूदा समय में उससे बड़ा 'बाहुबली' कोई और एसेट क्लास नहीं है।
अगर भारत की बात करें, तो यहां कच्चे तेल की कीमतें अपने लाइफ टाइम हाई (All-time High) पर पहुंच गई हैं। इसकी एक बड़ी वजह डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती साख भी है। वहीं दूसरी ओर, इंटरनेशनल मार्केट में भी कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। खासकर अमेरिकी तेल WTI के दाम 116 डॉलर प्रति बैरल के पार चले गए हैं, जो खाड़ी देशों के ब्रेंट क्रूड के मुकाबले करीब 4 डॉलर ज्यादा है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों तेल की कीमतों में यह बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है।
भारत में कच्चे तेल ने रचा नया इतिहास
भारतीय बाजार में कच्चे तेल ने मंगलवार को एक नया रिकॉर्ड कायम किया। एमसीएक्स (MCX) यानी मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर अप्रैल की सप्लाई वाले कच्चे तेल का भाव 300 रुपए या 2.83 प्रतिशत की छलांग लगाकर 10,888 रुपए प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया। सिर्फ अप्रैल ही नहीं, बल्कि मई के सौदों में भी तेजी देखी गई और यह 9,485 रुपए प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर को छू गया।
कारोबार के दौरान कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहा, लेकिन दोपहर तक यह 10,745 रुपए के आसपास ट्रेड करता दिखा। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल सप्लाई की खराब स्थिति और एनर्जी एक्सपोर्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते 'होर्मुज स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) को लेकर बनी अनिश्चितता इस तेजी की मुख्य वजह है। पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते तनाव ने व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे कीमतों को और हवा मिल रही है।
भारत में आखिर क्यों लगी तेल की कीमतों में आग?
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई डेडलाइन से पहले भू-राजनीतिक तनाव चरम पर है। चॉइस ब्रोकिंग की एनालिस्ट कावेरी मोरे के अनुसार, बाजार अब होर्मुज स्ट्रेट में होने वाली हर छोटी-बड़ी हलचल को लेकर बेहद संवेदनशील हो गया है। ईरान के तेल ठिकानों पर संभावित हमलों की धमकियों और ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की चेतावनियों ने सप्लाई चेन टूटने का डर पैदा कर दिया है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल व्यापार के लिए सबसे जरूरी रास्ता है, और वहां किसी भी तरह की रुकावट का मतलब है वैश्विक संकट। इसके साथ ही, अमेरिकी डॉलर का 100 के स्तर से ऊपर मजबूत होना और बढ़ती महंगाई की आशंकाओं ने भी तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है।
विदेशी बाजारों में डब्ल्यूटीआई (WTI) की बादशाहत
विदेशी बाजारों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी तेल वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) का वायदा भाव 4.14 डॉलर बढ़कर 116.55 डॉलर प्रति बैरल हो गया है। वहीं, खाड़ी देशों का ब्रेंट क्रूड 111.40 डॉलर प्रति बैरल पर है। यह एक दुर्लभ स्थिति है जब अमेरिकी तेल की कीमत खाड़ी देशों के तेल से ज्यादा हो गई है। जानकारों का साफ कहना है कि जब तक होर्मुज स्ट्रेट का विवाद नहीं सुलझता, तब तक कीमतों में नरमी की उम्मीद कम ही है।
क्या अभी और बढ़ेंगे दाम?
इंडसइंड सिक्योरिटीज़ के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट जिगर त्रिवेदी के अनुसार, WTI क्रूड अब 115-116 डॉलर की ओर बढ़ रहा है, जो जून 2022 के बाद का उच्चतम स्तर है। ट्रंप की ईरान को दी गई चेतावनी और ईरान के पॉवर प्लांट्स पर हमले की धमकियों ने आग में घी डालने का काम किया है। दूसरी ओर, इजराइल द्वारा ईरान के पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स पर हमले की खबरों ने निवेशकों को डरा दिया है। सबको यही डर सता रहा है कि यह संघर्ष कहीं पूरे क्षेत्र में न फैल जाए, जिससे तेल उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है। फिलहाल निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों पर है और आने वाले दिनों में बाजार में भारी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।

