कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय उस चौराहे पर खड़ी है, जहां हर किसी की नजरें नतीजों पर टिकी हैं। 15 साल से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी क्या चौथी बार वापसी करेंगी?
या फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) पहली बार बंगाल के सिंहासन पर बैठेगी? सवाल बड़ा है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि नतीजे जो भी हों, दिल्ली में बैठे राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए दोनों ही सूरतों में 'गुड न्यूज' छिपी है।
बीजेपी हारी तो सुकून, जीती तो राहुल का रास्ता साफ
आंकड़ों पर गौर करें तो 1977 के बाद से कांग्रेस बंगाल की सत्ता से ऐसी बाहर हुई कि आज वह मुख्य विपक्ष की रेस में भी कहीं नजर नहीं आती। बावजूद इसके, बंगाल चुनाव कांग्रेस के लिए काफी अहम है। अगर तमाम कोशिशों के बाद भी बीजेपी बंगाल नहीं जीत पाती है, तो कांग्रेस के लिए यह बड़ी राहत की बात होगी। इससे यह संदेश जाएगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह के चुनावी मैनेजमेंट को हराया जा सकता है।
लेकिन, अगर बीजेपी यहां जीत का परचम लहरा देती है, तो इसका दूसरा पहलू राहुल गांधी के लिए फायदेमंद होगा। ममता बनर्जी की हार का सीधा मतलब होगा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ताकत कम होगी। ऐसे में विपक्ष के चेहरे के तौर पर राहुल गांधी को चुनौती देने वाला कोई बड़ा क्षेत्रीय क्षत्रप नहीं बचेगा।
विपक्ष का चेहरा कौन? ममता की हार से खत्म होगा सिरदर्द
कांग्रेस फिलहाल राज्यों में बीजेपी की हार से ही अपनी जीत ढूंढ लेती है। बंगाल में भले ही कांग्रेस का खाता न खुले, लेकिन बीजेपी की हार से उसे नैरेटिव बनाने का मौका मिल जाता है। अगर हम विपक्ष के चेहरों को देखें, तो राहुल गांधी के सामने सिर्फ ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ही ऐसे नेता हैं जो चुनौती पेश कर सकते हैं।
अखिलेश यादव पिछले 10 साल से यूपी की सत्ता से बाहर हैं, हालांकि हालिया लोकसभा चुनाव में उनकी ताकत बढ़ी है। वहीं ममता बनर्जी इकलौती ऐसी नेता रही हैं जो बीजेपी को सीधी टक्कर देती आई हैं। अगर ममता फिर जीतती हैं, तो 2029 के चुनाव में 'इंडिया' गठबंधन के नेतृत्व को लेकर राहुल बनाम ममता की बहस छिड़ सकती है। ममता की हार इस संभावना को ही खत्म कर देगी, जिससे राहुल गांधी का रास्ता निष्कंटक हो जाएगा।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के पतन की कहानी
बंगाल में कांग्रेस का आखिरी सुनहरा दौर 1972 में था, जब सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री थे। उसके बाद 1977 में वामपंथियों का ऐसा दौर शुरू हुआ कि ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मिलकर 34 साल तक राज किया। 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंका और तब से वह लगातार जीत रही हैं।
इस बीच, बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया। ममता को रोकने के लिए वामपंथी और कांग्रेस के वोटर्स बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गए। नतीजा यह हुआ कि आज बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट की जमीन पूरी तरह खिसक चुकी है और उनकी जगह बीजेपी ने ले ली है।
चुनावी आंकड़ों में कांग्रेस की गिरती साख
- 1972: कांग्रेस ने 216 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।
- 1977: इमरजेंसी के बाद कांग्रेस महज 20 सीटों पर सिमट गई।
- 2001: ममता की टीएमसी ने 60 सीटें जीतकर कांग्रेस को मुख्य विपक्ष की कुर्सी से हटा दिया।
- 2011: ममता ने 184 सीटें जीतकर इतिहास रचा, बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था।
- 2021: बीजेपी 3 से बढ़कर 77 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट 'जीरो' पर आउट हो गए।
लोकसभा चुनाव: ममता बनाम बीजेपी की जंग
1998 में ममता ने जब कांग्रेस छोड़ी थी, तब वह बीजेपी के साथ एनडीए में थीं। लेकिन समय बदला और समीकरण भी। 2014 की मोदी लहर में भी ममता ने 34 सीटें जीती थीं। हालांकि, 2019 में बीजेपी ने 18 सीटें जीतकर ममता को कड़ी चुनौती दी। 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता ने फिर वापसी की और 29 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी 12 पर सिमट गई और कांग्रेस सिर्फ 1 सीट बचा पाई।
अब विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि बंगाल की राजनीति किस करवट बैठेगी, लेकिन राहुल गांधी के लिए यह 'चित भी मेरी, पट भी मेरी' वाला मामला नजर आ रहा है।

