केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले एक दशक के दौरान देश के ग्रामीण इलाकों में बैंकिंग सुविधाओं को आसान और सुलभ बनाने की दिशा में कई ऐतिहासिक काम किए हैं। इन प्रयासों में शून्य बैलेंस वाले जनधन खाते खोलने से लेकर गांव-गांव में 'बैंक सखियों' की नियुक्ति करना शामिल है।
सरकार के इन कदमों की बदौलत आज ग्रामीण इलाकों की महिलाएं भी बिना किसी हिचकिचाहट के आसानी से सभी बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उठा रही हैं।
गांवों में बैंकिंग व्यवस्था को अधिक सरल बनाने के उद्देश्य से देश की ग्राम पंचायतों में बैंक सखियों की तैनाती की गई है। वर्तमान समय में पूरे देश में 50,000 से भी ज्यादा बैंक सखियां मुस्तैदी से अपना काम कर रही हैं। ये बैंक सखियां ग्रामीण समुदायों में वित्तीय समावेशन को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं। वे महिलाओं को जरूरी बैंकिंग सेवाएं देने, रोजमर्रा के लेन-देन में मदद करने और क्रेडिट सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ आम जनता और बैंकों के बीच की दूरी को मिटाने का काम कर रही हैं।
बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ीं देश की करोड़ों महिलाएं
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल की शुरुआत में ही ऐतिहासिक ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ का शुभारंभ किया था। इस योजना की शुरुआत 28 अगस्त 2014 को की गई थी। प्रधानमंत्री जनधन योजना ने देश के कोने-कोने में रहने वाली करोड़ों महिलाओं को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से सीधे जोड़ने का काम किया है। इससे न केवल उनकी आर्थिक आजादी मजबूत हुई है, बल्कि विभिन्न सरकारी योजनाओं की सब्सिडी और आर्थिक सहायता भी बिना किसी बिचौलिए के सीधे उन तक आसानी से पहुंच रही है। इस व्यवस्था से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं।
जनधन योजना के 12 साल हुए पूरे
प्रधानमंत्री जनधन योजना ने 28 अगस्त को अपने सफलतम 12 साल पूरे कर लिए हैं। इन 12 वर्षों में देशभर की करोड़ों महिलाओं का सरकारी बैंकों में जनधन खाता खोला गया है, जिसके माध्यम से सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे उनके खातों में जमा हो रहा है। इस योजना ने ग्रामीण महिलाओं में बचत करने की आदत को बढ़ावा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन महिलाओं को बैंकिंग की छोटी-बड़ी सुविधाओं से अवगत कराने और अपने छोटे-मोटे कारोबार के लिए ऋण (लोन) लेने से जुड़ी जानकारियां देने में ये बैंक सखियां अहम कड़ी साबित हो रही हैं।
आर्थिक स्वतंत्रता से मजबूत हुए महिलाओं के फैसले
प्रधानमंत्री जनधन योजना ने ग्रामीण महिलाओं को अपने वित्तीय फैसले खुद लेने की अभूतपूर्व स्वतंत्रता दी है। अपनी गाढ़ी कमाई की बचत करने से लेकर परिवार के भविष्य की बेहतर योजना बनाने तक, बैंकिंग सेवाओं ने महिलाओं को अपने पैसों पर पूरा नियंत्रण और आत्मनिर्भर बनने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है।
करोड़ों महिलाओं के नाम दर्ज हुआ अपना बैंक खाता
वित्तीय स्वतंत्रता की पहली शुरुआत वित्तीय पहुंच से ही होती है। प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत लगभग 33 करोड़ महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत नाम से बैंक खाते खोले हैं। इस उपलब्धि से उन्हें अपने पैसे और उससे जुड़े वित्तीय फैसलों पर पहले से कहीं अधिक अधिकार और नियंत्रण मिला है।
बैंकिंग सुविधाओं से सशक्त हुईं देश की करोड़ों महिलाएं
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2014 में देश की महज 43 प्रतिशत महिलाओं के पास ही अपना बैंक खाता उपलब्ध था। वहीं साल 2024 तक यह आंकड़ा जबरदस्त उछाल के साथ 89 फीसदी पर पहुंच गया। यह बड़ा बदलाव देश में महिलाओं की बढ़ती वित्तीय भागीदारी और उनकी आत्मनिर्भरता की एक बेहद मजबूत तस्वीर पेश करता है। 2014 से 2024 के बीच महिलाओं के बैंक खाता स्वामित्व में 43% से 89% तक की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में पुरुषों का बैंक खाता स्वामित्व 62 फीसदी से बढ़कर 88 प्रतिशत पहुंचा है। यह ऐतिहासिक बदलाव भारत में वित्तीय समावेशन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।
संकट के समय महिलाओं तक पहुंची सीधी आर्थिक मदद
यह प्रधानमंत्री जनधन योजना का ही असर था कि कोरोना महामारी जैसे गंभीर संकट के दौर में 20 करोड़ से भी अधिक महिला जनधन खाताधारकों को DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए सीधे उनके खातों में आर्थिक मदद भेजी गई। जनधन खातों की मौजूदगी के कारण ही विपत्ति के उस समय में राहत राशि बिना किसी देरी के तुरंत जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंच सकी।

