पाकिस्तान में महंगाई की मार कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि लोग अपनों को खोने के बाद उनके अंतिम संस्कार का खर्च उठाने में भी लाचार हो रहे हैं। रावलपिंडी जैसे बड़े शहरों से आई रिपोर्ट्स रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं।
गरीब परिवार अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। सरकारी फाइलों में भले ही आर्थिक स्थिरता के दावे किए जा रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि आम आदमी की कमर पूरी तरह टूट चुकी है।
अंतिम संस्कार भी बना एक आर्थिक संकट
एक समय था जब स्थानीय लोग और पड़ोसी मिल-जुलकर निस्वार्थ भाव से अंतिम संस्कार की रस्मों में मदद करते थे, लेकिन अब यह पुरानी परंपरा लगभग दम तोड़ चुकी है। 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, अब कफन से लेकर फूलों तक, हर चीज के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है।
एक औसत अंतिम संस्कार का गणित डरा देने वाला है:
- कफन और पूजा सामग्री: कफन के लिए 3,000 से 4,000 रुपये और गुलाब जल, कपूर व फूलों के लिए 2,000 से 2,500 रुपये तक खर्च हो जाते हैं।
- कब्र और खुदाई: कब्र के लिए जगह लेने, उसे खोदने और ईंटों से तैयार करने का खर्च 40,000 से 45,000 रुपये तक पहुंच गया है।
- अंतिम संस्कार की रस्में: मृतक को नहलाने के लिए 1,000 से 1,500 रुपये की मजदूरी देनी पड़ती है। यदि परिवार पक्की कब्र बनवाना चाहे, तो सीमेंट और मार्बल के काम के लिए 15,000 से 30,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है।
जगह की कमी इतनी गंभीर है कि कई कब्रिस्तानों में 'नो वैकेंसी' के बोर्ड लग चुके हैं, और कुछ जगहों पर तो पुरानी कब्रों को हटाने तक की खबरें सामने आ रही हैं।
आंकड़ों और हकीकत का अंतर
पाकिस्तान सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, जून 2026 में महंगाई दर 11.1 प्रतिशत दर्ज की गई। सरकारी विशेषज्ञ इसे 'संभालने लायक' कह सकते हैं, लेकिन उन परिवारों के लिए यह बेहद क्रूर है जिन्होंने पिछले कई सालों से लगातार बढ़ती कीमतों का दंश झेला है। पेट्रोल, बिजली, राशन और अब अंतिम संस्कार के खर्च-सब कुछ आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
आईएमएफ (IMF) का दबाव और सरकारी बेबसी
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय कड़े वित्तीय अनुशासन के दौर से गुजर रही है। सरकार को 7 अरब डॉलर के आईएमएफ कार्यक्रम के तहत जीडीपी का 2 प्रतिशत सरप्लस बनाए रखना है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार के पास बजट ही नहीं बचा है। डिफेंस बजट में 18 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि विकास कार्यों के नाम पर बहुत सीमित फंड है। आईएमएफ की शर्तों के चलते बिजली और टैक्स से जुड़ी नीतियां आम जनता के लिए किसी सजा से कम नहीं हैं।
क्या अर्थव्यवस्था वास्तव में सुधर रही है?
इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, पाकिस्तान की जीडीपी ग्रोथ 3.7 प्रतिशत रही है और प्रति व्यक्ति आय भी बढ़कर 1,901 डॉलर हो गई है। लेकिन यह 'मैक्रो-इकोनॉमिक' सुधार आम आदमी की रसोई या उसके दुखों को कम नहीं कर पा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार और फिस्कल डेफिसिट के आंकड़ों में सुधार का अहसास तब तक बेमानी है, जब तक एक पिता अपने बच्चे के अंतिम संस्कार के लिए साहूकारों के चक्कर काटता रहेगा। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कागजों पर भले ही संकट से बाहर निकल आई हो, लेकिन आम नागरिक के लिए यह अभी भी अस्तित्व की लड़ाई बनी हुई है।

