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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए क्या कहा

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जानिए क्या कहा

UPUK Live 2 months ago

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) की कार्यप्रणाली और शक्तियों को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अपने इस फैसले में दो टूक शब्दों में कहा है कि यह आयोग केवल सिफारिश करने और सलाह देने वाला एक निकाय है, और इसके पास किसी भी अदालत की तरह न्यायिक आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट के इस स्पष्टीकरण से आयोग के कार्यक्षेत्र की सीमाएं बिल्कुल साफ हो गई हैं।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने?

इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने यह साफ किया कि आयोग अपने कामकाज के दौरान देश के राज्यों या केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें भेज सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि नौकरी से जुड़े मामलों में आयोग की तरफ से दिया गया कोई भी आदेश किसी भी पक्ष पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा, “NCSC को दी गई शक्तियां सीमित हैं। संविधान के अनुच्छेद 338A और 338B के तहत यह और इस तरह के अन्य सभी आयोग सामाजिक भलाई के उद्देश्य से बनाए गए संवैधानिक निकाय हैं। देश की विधायिका ने इनकी भूमिका सलाह और सिफारिश देने वाली तय की है, न कि फैसले सुनाने वाली। इन्हें किसी भी तरह से अदालती कामकाज अपने हाथ में लेने के लिए नहीं बनाया गया है।”

अन्य आयोगों पर भी पड़ सकता है इस फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े और स्पष्ट आदेश का असर समाज के अलग-अलग वर्गों की भलाई के लिए बनाए गए अन्य वैधानिक और संवैधानिक निकायों पर भी पड़ सकता है। कानूनी जानकारों का मानना है कि इसका सीधा मतलब यह है कि महिलाओं, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए बने विभिन्न आयोगों के आदेशों और उनकी शक्तियों पर भी यही नियम लागू हो सकता है।

जांच कर सकते हैं, पर आदेश देने का हक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रावधान को भी बहुत विस्तार से समझाया जिसके तहत आयोग को ‘अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा के हनन से जुड़ी विशेष शिकायतों की जांच’ करने की शक्ति मिली हुई है। बेंच ने कहा कि भले ही आयोग के पास संबंधित दस्तावेज मंगाने और गवाही या सबूत स्वीकार करने का पूरा अधिकार हो, लेकिन वह उन सबूतों या दस्तावेजों के आधार पर कोई भी न्यायिक आदेश पारित नहीं कर सकता।

आसान शब्दों में समझें तो NCSC सिर्फ तथ्यों के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाल सकता है और फिर संबंधित केंद्र या राज्य सरकार को उस पर आगे की कार्रवाई करने के लिए कह सकता है।

आयोग की यह दलील हुई खारिज

सुनवाई के दौरान NCSC की तरफ से यह दलील पेश की गई थी कि नियमों में ‘सुरक्षा’ शब्द का विशेष रूप से जिक्र है, जिसका मतलब कानून को जमीन पर लागू कराना भी होता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कानून की भाषा बिल्कुल साफ और पारदर्शी है।

यह किसी भी स्थिति में आयोग को न्यायिक शक्तियां प्रदान नहीं करती है, बल्कि यह ज्यादा से ज्यादा केवल सिफारिशी प्रकृति की ही होती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि आयोग न तो किसी अदालत या ट्रिब्यूनल की भूमिका निभा सकता है और न ही वह दो पक्षों के बीच के अधिकारों पर अपना कोई फैसला सुना सकता है।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: UPUKLive