अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के जरिए पूरी दुनिया में हड़कंप मचा दिया है। फॉक्स न्यूज को दिए महज 15 मिनट के इंटरव्यू में ट्रंप ने जो कहा, उसने वैश्विक राजनीति की धड़कनें तेज कर दी हैं।
ट्रंप का साफ कहना है, "अगर ईरान ने जल्दी डील नहीं की, तो मैं सब कुछ उड़ाने और उनके तेल पर कब्जा करने पर विचार कर रहा हूँ।" यह कोई मामूली बयान नहीं है, बल्कि यह ट्रंप की उस खतरनाक 'रिसोर्स कंट्रोल' नीति का हिस्सा है, जिसके जरिए अमेरिका दशकों से दूसरे देशों के संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत करता आया है।
इतिहास गवाह है कि जब भी 'अंकल सैम' की नजर किसी देश के काले सोने यानी तेल पर पड़ी है, तो वहां का भूगोल और नक्शा दोनों बदल गए हैं। इराक में सद्दाम हुसैन के दौर का अंत हो, सीरिया के मलबे में तब्दील तेल के कुएं हों या वेनेजुएला के राष्ट्रपति का नाटकीय घटनाक्रम-ये सब ट्रंप की इसी रणनीति के गवाह रहे हैं। अब ट्रंप का अगला निशाना ईरान का वह विशाल तेल नेटवर्क है, जिसके दम पर तेहरान सालों से अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात करता रहा है।
इराक, सीरिया और वेनेजुएला: ट्रंप के ब्लूप्रिंट की कड़वी हकीकत
ट्रंप की 'टेक ओवर द ऑयल' (तेल पर कब्जा) नीति को समझने के लिए उन देशों के हालातों को देखना जरूरी है, जहाँ अमेरिका पहले ही 'रिसोर्स मैनेजमेंट' के नाम पर अपने पैर जमा चुका है। सीरिया से अपनी सेना हटाने के बावजूद ट्रंप ने वहां के तेल कुओं पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ा। उनका तर्क बहुत सीधा था-"हमने तेल सुरक्षित रखा है।" वहीं इराक के मामले में ट्रंप हमेशा यह मलाल जताते रहे हैं कि अमेरिका ने वहां अरबों डॉलर तो खर्च किए, लेकिन तेल पर कब्जा नहीं किया। लेकिन 2026 तक आते-आते अमेरिका ने इराक के तेल ढांचे पर अपनी ऐसी पकड़ बना ली है कि आज बगदाद की आर्थिक धड़कनें वाशिंगटन के इशारे पर चलती हैं।
दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश वेनेजुएला का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। ट्रंप ने वेनेजुएला पर प्रतिबंधों का ऐसा जाल बुना कि वहां की सरकारी तेल कंपनी PDVSA को चलाने के लिए भी अमेरिकी कंपनियों का सहारा लेना पड़ रहा है। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के साथ हुए घटनाक्रम के बाद वेनेजुएला का तेल अब ट्रंप की ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बन चुका है, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं।
ईरान के लिए आखिरी चेतावनी? सोमवार तक की डेडलाइन
ट्रंप ने अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि अगर सोमवार तक ईरान ने उनकी शर्तों को नहीं माना, जिसमें हॉर्मुज की खाड़ी को खुला रखना और परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना शामिल है, तो अंजाम बुरा होगा। ट्रंप की योजना के अनुसार, अमेरिकी वायुसेना ईरान के बिजली संयंत्रों, प्रमुख पुलों और खासकर 'खार्ग द्वीप' के तेल टर्मिनलों को निशाना बना सकती है। यह ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने की सीधी तैयारी है।
कूटनीति का अंत या महायुद्ध की आहट?
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह आक्रामक रुख केवल ईरान को डराने के लिए नहीं है, बल्कि यह चीन जैसे देशों के लिए भी एक बड़ा संदेश है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और अगर ट्रंप ईरान के तेल पर सीधा नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो वे वैश्विक ऊर्जा राजनीति के निर्विवाद बादशाह बन जाएंगे। यह 'ऑयल वॉर' तय करेगा कि आने वाले समय में दुनिया की महाशक्ति कौन रहेगा-वाशिंगटन या बीजिंग? ट्रंप के लिए यह महज कोई युद्ध नहीं, बल्कि एक 'बिजनेस डील' की तरह है, जिसमें वे हारने का जोखिम बिल्कुल नहीं लेना चाहते।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
ट्रंप 'सब कुछ उड़ाने' की धमकी क्यों दे रहे हैं? यह ट्रंप की मशहूर 'मैडमैन थ्योरी' का हिस्सा है। इसका मकसद ईरान के मन में इतना डर पैदा करना है कि वह बिना युद्ध लड़े ही समझौते की मेज पर झुक जाए। ट्रंप का मानना है कि बुनियादी ढांचे को तबाह करने से ईरान दशकों पीछे चला जाएगा और फिर कभी अमेरिका को चुनौती नहीं दे पाएगा।
क्या अमेरिका वास्तव में ईरान के तेल पर कब्जा कर सकता है? सीरिया और इराक के अनुभवों को देखते हुए, अमेरिका के पास ऐसी रणनीतिक ताकत है कि वह ईरान के प्रमुख तेल निर्यात केंद्रों को या तो अपने कब्जे में ले सकता है या उन्हें पूरी तरह ठप कर सकता है। इससे ईरान की कमाई का मुख्य जरिया पूरी तरह बंद हो जाएगा।
वेनेजुएला से तेल सप्लाई शुरू करवाने के पीछे क्या खेल है? यह ट्रंप की एक बहुत ही सोची-समझी चाल है। उन्होंने पहले ही वेनेजुएला से तेल का फ्लो बढ़ाकर ग्लोबल मार्केट को सुरक्षित कर लिया है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि अगर ईरान के साथ युद्ध छिड़ता है या तेल क्षेत्र तबाह होते हैं, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बेकाबू न हों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर आंच न आए।

