उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब क्या मोड़ आ जाए, यह कहना हमेशा से ही मुश्किल रहा है। अयोध्या के श्री राम मंदिर और उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का ताजा बयान इसी अनिश्चितता को बयां कर रहा है।
मायावती ने जहां एक तरफ मंदिर प्रबंधन की जांच के लिए एसआईटी (SIT) और सरकार की सक्रियता की मांग की है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) जैसे विपक्षी दलों को आड़े हाथों लिया है। मायावती के इस रुख के बाद अब राजनीतिक गलियारों में बड़े सियासी कयास लगने शुरू हो गए हैं।
दरअसल, चुनावी विश्लेषक और राजनीतिक पंडित मायावती के इस बयान के पीछे एक बड़ी क्रोनोलॉजी देख रहे हैं। चर्चाएं तेज हैं कि बसपा आगामी चुनावों में सपा या कांग्रेस के साथ जाने के मूड में बिल्कुल नहीं है। कयास इस बात के भी हैं कि मायावती या तो अंदरखाने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ किसी गठबंधन की जमीन तैयार कर रही हैं, या फिर वह एक बार फिर 'एकला चलो रे' की रणनीति पर चलते हुए अकेले चुनाव लड़ने का मन बना चुकी हैं।
सपा और कांग्रेस पर तीखा हमला: क्या टूट चुके हैं गठबंधन के सारे रास्ते?
मायावती ने अपने बयान में जिस तरह सपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से चढ़ावे में गड़बड़ी के पुख्ता सबूत मांगे हैं और उनके दावों को "कोरी राजनीति" करार दिया है, वह बेहद महत्वपूर्ण है। स्थानीय विश्लेषकों के अनुसार, जब कोई दल किसी के साथ भविष्य में गठबंधन की थोड़ी भी गुंजाइश रखता है, तो वह विपक्षी खेमे पर इस तरह के सीधे और तीखे हमले करने से बचता है।
मायावती ने साफ तौर पर कहा है कि ये पार्टियां जनहित के मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ चुनाव में फायदा लेने के लिए इस मुद्दे की आड़ ले रही हैं। उनके इस प्रहार से यह संकेत साफ मिलता है कि बसपा इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन या इंडिया ब्लॉक का हिस्सा बनने के बारे में विचार नहीं कर रही है।
बीजेपी से नजदीकी या 'एकला चलो' की नीति? क्या कहते हैं विश्लेषक
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अगर मायावती अकेले चुनाव मैदान में उतरती हैं या बीजेपी के प्रति थोड़ा नरम रुख अख्तियार करती हैं, तो इसके पीछे उत्तर प्रदेश के वोट बैंक के समीकरण छिपे हैं। आइए समझते हैं कि इन दोनों ही सूरतों में राज्य के सियासी समीकरण कैसे रह सकते हैं:
- अकेले चुनाव लड़ने पर (त्रिकोणीय मुकाबला): अगर बसपा सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ती है, तो उत्तर प्रदेश में मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में दलित, मुस्लिम और ओबीसी वोटों का बिखराव होना तय है। इसका सीधा नुकसान सपा और कांग्रेस के गठबंधन को उठाना पड़ सकता है, क्योंकि विपक्ष का वोट बैंक आपस में बंट जाएगा। इतिहास गवाह है कि जब भी यूपी में बहुकोणीय मुकाबला हुआ है, उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला है।
- बीजेपी के प्रति नरम रुख या गठबंधन की संभावना: मायावती का विपक्षी दलों पर हमला बोलना और सीधे तौर पर सरकार व एसआईटी से निष्पक्ष जांच की मांग करना, बीजेपी के कोर वोट बैंक (सनातनी/हिंदू वोटर) को यह संदेश देता है कि वह आस्था के नाम पर राजनीति करने के पक्ष में नहीं हैं। विश्लेषक मानते हैं कि भले ही औपचारिक रूप से बीजेपी और बसपा का गठबंधन न हो, लेकिन चुनावी मैदान में बसपा का अकेले उतरना भी पर्दे के पीछे से बीजेपी के लिए राह आसान करने जैसा साबित हो सकता है।
जनहित बनाम आस्था: मायावती की नई चुनावी पिच
बसपा प्रमुख ने अपने बयान के जरिए एक नई लाइन खींचने की कोशिश की है। उन्होंने एक तरफ श्रद्धालुओं की आस्था का सम्मान करते हुए मंदिर प्रबंधकों की भूमिका पर सवाल उठाए, तो दूसरी तरफ विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया। विश्लेषकों के अनुसार, मायावती अब खुद को एक ऐसी धुरी के रूप में स्थापित करना चाहती हैं जो न तो पूरी तरह बीजेपी के एजेंडे में बहे और न ही सपा-कांग्रेस के सुर में सुर मिलाए।
अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में मायावती के इन बयानों का जमीन पर क्या असर दिखता है। क्या बसपा सचमुच अकेले दम पर अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए मैदान में उतरेगी, या फिर यूपी की राजनीति में कोई नया गठबंधन देखने को मिलेगा? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल मायावती के इस दांव ने विपक्षी खेमे की धड़कनें जरूर बढ़ा दी हैं।

