देश के कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) के दिन अब जल्द ही बहुरने वाले हैं। केंद्र सरकार इस सेक्टर को मंदी और कच्चे माल की किल्लत से उबारने के लिए एक बहुत बड़े पैकेज या राहत का ऐलान कर सकती है।
अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, मोदी सरकार विदेशों से आने वाले कच्चे कपास (रॉ कॉटन) पर लगने वाले 11 प्रतिशत के भारी-भरकम कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) को पूरी तरह से हटाने पर बेहद गंभीरता से विचार कर रही है।
अगर सरकार इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर लगा देती है, तो भारतीय कपड़ा मिलों की चांदी हो जाएगी। इस फैसले से न सिर्फ कपड़ा तैयार करने की लागत (प्रोडक्शन कॉस्ट) में भारी कमी आएगी, बल्कि घरेलू बाजार में लगातार महंगी हो रही कपास की कीमतों से भी कारोबारियों को बड़ी राहत मिल जाएगी।
कपड़ा उद्योग लंबे समय से लगा रहा था गुहार, अब पूरी होगी मुराद
आपको बता दें कि देश के तमाम छोटे-बड़े कपड़ा कारोबारी और मिल मालिक काफी समय से सरकार से इस 11% आयात शुल्क को हटाने की मांग कर रहे थे। उद्योग जगत की दलील थी कि भारतीय बाजार में कच्चे कपास की भारी कमी हो गई है और जो माल उपलब्ध है, उसकी कीमतें आसमान छू रही हैं। इस वजह से प्रोडक्शन ठप होने की कगार पर पहुंच गया है और कपड़ा मिलों समेत कपड़ा निर्यात करने वालों पर भारी आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। टेक्सटाइल संगठनों ने सरकार को भरोसा दिलाया है कि अगर यह टैक्स हटता है, तो वे विदेशों से अच्छी क्वालिटी का सस्ता कपास भारत ला सकेंगे, जिससे पूरे उद्योग को नई जिंदगी मिलेगी।
तीन बड़े मंत्रालयों के बीच महामंथन, आखिरी दौर में पहुंची बातचीत
मीडिया रिपोर्ट्स से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस समय देश के तीन सबसे अहम मंत्रालय यानी वित्त मंत्रालय, कपड़ा मंत्रालय और कृषि मंत्रालय इस प्रस्ताव को लेकर लगातार हाई-लेवल बैठकें कर रहे हैं। सरकार इस बात की बारीकी से समीक्षा कर रही है कि अगर इम्पोर्ट ड्यूटी हटाई जाती है, तो देश के किसानों, मिल मालिकों और आम ग्राहकों पर इसका क्या असर पड़ेगा। बताया जा रहा है कि मंत्रालयों के बीच चल रही यह बातचीत अब अपने आखिरी दौर में पहुंच चुकी है और बहुत जल्द ही इस पर कैबिनेट की मुहर लग सकती है।
मांग और सप्लाई के बीच का यह बड़ा अंतर बनी सरकार की सिरदर्दी
भारतीय कपड़ा उद्योग इस समय कच्चे माल यानी कॉटन की भारी किल्लत से जूझ रहा है, जो सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है। एक अनुमान के मुताबिक, इस चालू वर्ष में देश की कपड़ा मिलों को करीब 337 लाख गांठ कपास की सख्त जरूरत है। इसके मुकाबले देश में इस साल सिर्फ 292 लाख गांठ कपास का उत्पादन होने की ही उम्मीद जताई जा रही है। मांग और सप्लाई के बीच का यह 45 लाख गांठ का बड़ा अंतर ही बाजार में कपास की कीमतों में आग लगा रहा है, जिसे बुझाने के लिए सरकार को अब विदेशी कपास का सहारा लेना पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में मचेगी धूम, भारत के कपड़ा निर्यात को मिलेंगे पंख
बाजार के जानकारों का साफ कहना है कि सरकार का यह एक फैसला भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री को ग्लोबल मार्केट में किंग बना सकता है। जब टैक्स हटने से लागत कम होगी, तो भारतीय कपड़ों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी। इससे बांग्लादेश, वियतनाम और चीन जैसे देशों को पछाड़कर भारतीय निर्यातक ज्यादा से ज्यादा विदेशी ऑर्डर हासिल कर सकेंगे। भारत पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े कपड़ा उत्पादकों में से एक है, और यह कदम हमारे एक्सपोर्ट को रॉकेट की रफ्तार दे सकता है।
मिल मालिकों के साथ-साथ अन्नदाताओं के हितों का भी रखा जाएगा ख्याल
इस पूरे मामले में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के कपास किसानों के हितों की रक्षा करना है। सरकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क है कि विदेशों से सस्ता कपास आने के चक्कर में कहीं देश के अपने किसानों को नुकसान न उठाना पड़े या उन्हें फसल के सही दाम मिलना बंद न हो जाएं। यही वजह है कि वित्त और कृषि मंत्रालय मिलकर एक ऐसा बीच का रास्ता निकाल रहे हैं जिससे देश के करोड़ों अन्नदाताओं और लाखों कपड़ा मिल मालिकों, दोनों के हितों के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाया जा सके।

