तमिलनाडु की राजनीति में इस समय भूचाल आ गया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार एक बड़े विवाद में फंसी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री की कैबिनेट बैठक में दो ऐसे लोग शामिल हुए जिन्हें वहां होने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था।
भाजपा का कहना है कि यह न केवल प्रोटोकॉल का उल्लंघन है, बल्कि 'गोपनीयता की शपथ' का भी अपमान है।
आखिर कौन हैं वो दो लोग?
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को सौंपे गए ज्ञापन में दो नामों का जिक्र किया है-जॉन आरोकियासामी और विष्णु रेड्डी। भाजपा का दावा है कि ये दोनों व्यक्ति न तो मंत्री हैं और न ही सरकार के किसी पद पर हैं, फिर भी ये कैबिनेट की अहम बैठक में कैसे मौजूद थे? इस मुद्दे पर भाजपा ने राज्यपाल से कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
सरकार का क्या है कहना?
वहीं, सत्ताधारी दल टीवीके (TVK) ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है। सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि जॉन आरोकियासामी और विष्णु रेड्डी अब 'बाहरी' नहीं हैं, बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री के विशेष सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। सरकार के इस जवाब के बाद विवाद और बढ़ गया है, क्योंकि विपक्ष इसे तर्क मानने को तैयार नहीं है।
शिक्षा मंत्री पर गंभीर आरोप और बिगड़ती कानून-व्यवस्था
राज्यपाल से मुलाकात के दौरान भाजपा नेताओं ने केवल कैबिनेट बैठक तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि सरकार पर कई और गंभीर आरोप भी लगाए। नैनार नागेंद्रन ने राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री विश्वनाथन पर बच्चियों के साथ 'अनुचित व्यवहार' का बेहद संवेदनशील आरोप लगाया है। इसके साथ ही, भाजपा ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए। नागेंद्रन के मुताबिक, विजय सरकार के मात्र 54 दिनों के कार्यकाल में 151 यौन शोषण, 85 हत्याएं और ड्रग्स की तस्करी जैसे मामले सामने आए हैं, जो प्रदेश की बिगड़ती स्थिति को दर्शाते हैं।
राज्यपाल के अधिकारों का समर्थन
विवाद के बीच, भाजपा ने मदुरै में राज्यपाल अर्लेकर द्वारा की गई समीक्षा बैठक का भी पुरजोर बचाव किया। नागेंद्रन ने साफ किया कि संविधान के अनुच्छेद 167 के तहत राज्यपाल के पास राज्य के मामलों की समीक्षा करने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। देखना दिलचस्प होगा कि राज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद विजय सरकार पर क्या कार्रवाई होती है।

