अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप की सरकार एक बार फिर कड़े फैसले लेने की तैयारी में है, जिससे दुनिया भर के 60 देशों की नींद उड़ सकती है। भारत समेत इन देशों के लिए चिंता की बात यह है कि अमेरिका अपने आयात शुल्क (टैरिफ) को और अधिक बढ़ाने जा रहा है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन देशों में 'जबरन श्रम' (Forced Labour) से बने सामानों को सप्लाई चेन में रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इस मुद्दे पर अमेरिका अब तीन दिनों की विशेष सुनवाई भी शुरू कर चुका है। भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए जांच को बंद करने की मांग की है।
क्या है पूरा मामला और क्यों हो रही है जांच?
यह जांच मार्च 2026 में शुरू की गई थी। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि किन देशों की मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों में जबरन श्रम का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा, उन देशों की भी जांच की गई जो ऐसे सामानों के आयात पर रोक लगाने में विफल रहे हैं, जिन्हें बाद में अमेरिका निर्यात कर दिया जाता है। अमेरिकी व्यापार मंत्रालय (USTR) का यह कदम उन देशों पर दबाव डालने के लिए है जो जबरन श्रम से जुड़े मामलों में ढिलाई बरत रहे हैं।
10% से 12.5% तक बढ़ सकती है ड्यूटी
जून की शुरुआत में ही अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि सभा (UTR) ने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। इसके तहत भारत और 59 अन्य देशों से आने वाले सामानों पर 10% से 12.5% तक अतिरिक्त ड्यूटी लगाने की तैयारी है। धारा 301 के तहत की गई इस जांच के नतीजे अगर लागू होते हैं, तो यह भारत और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापारिक संबंधों और जारी बातचीत के लिए एक बड़ी बाधा बन सकते हैं। भारतीय निर्यातकों के लिए यह एक बड़ा झटका हो सकता है क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा।
'असमान प्रतिस्पर्धा' बर्दाश्त नहीं करेगा अमेरिका
अमेरिकी राजदूत जैमीसन ग्रीर ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि अमेरिका अब 'असमान प्रतिस्पर्धा' (Uneven Competition) को और अधिक बर्दाश्त नहीं करेगा। उनका कहना है कि जो देश जबरन श्रम से बने सामानों को रोकने में नाकाम रहे हैं, वे अमेरिकी श्रमिकों के लिए अनुचित स्थिति पैदा कर रहे हैं। हालांकि अमेरिका ने यह भी माना है कि कुछ देशों ने इस दिशा में शुरुआती कदम उठाए हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। साफ है कि आने वाले समय में अमेरिका अपने व्यापारिक नियमों को और भी सख्त करने वाला है, जिसका असर भारत जैसे बड़े निर्यातकों पर पड़ना तय है।

