संसद से पास बिल पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कड़ी आपत्ति
गुरुवार को संसद से पास हुए वंदे मातरम के अपमान से जुड़े नए बिल को लेकर सियासत और विवाद गर्माता जा रहा है। इस बिल में वंदे मातरम का अपमान करने को सजा योग्य अपराध माना गया है, जिसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसकी कड़ी आलोचना की है।
बोर्ड ने इस बिल को धार्मिक और संवैधानिक आजादी पर सीधा हमला करार दिया है। साथ ही सरकार से यह जोरदार अपील की है कि देशभक्ति की भावना को किसी भी तरह के कानूनी दबाव के जरिए जनता पर न थोपा जाए।
धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ कानून
31 जुलाई को जारी की गई अपनी प्रेस रिलीज में मुस्लिम संगठन ने साफ तौर पर कहा है कि यह कानून देश की संवैधानिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भावना के पूरी तरह खिलाफ है और यह नागरिकों की धार्मिक आजादी पर एक बहुत बड़ा हमला है। बोर्ड का यह कड़ा तर्क था कि किसी ऐसे गीत या नारे में शामिल होने के लिए लोगों को मजबूर करना, जिसके अपने धार्मिक अर्थ हों, सीधे तौर पर संविधान की तरफ से दिए गए मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।
वंदे मातरम को अनिवार्य करना संवैधानिक और इस्लामी मान्यताओं के खिलाफ: इलियास
बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने इस मामले पर बेबाक राय रखते हुए कहा है कि सभी समुदायों के लिए वंदे मातरम को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना संवैधानिक सिद्धांतों और इस्लामी मान्यताओं दोनों के ही पूरी तरह खिलाफ है। उन्होंने आगे कहा कि कानूनी प्रेशर के जरिए सभी वर्गों और धार्मिक समुदायों के लिए वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने की कोई भी कोशिश न सिर्फ बेहद आपत्तिजनक है, बल्कि हमारे देश के संविधान के मौलिक सिद्धांतों के भी विपरीत है।
संविधान सभा के पुराने फैसलों का दिया हवाला
बोर्ड की मानें तो जब देश का संविधान बनाया जा रहा था, तब संविधान सभा ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो पद ही स्वीकार किए थे। इसके अलावा गीत के बाकी हिस्सों में मौजूद धार्मिक अर्थों को भारत के मूल धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल बिल्कुल भी नहीं माना गया था।
‘तौहीद’ के सिद्धांत के खिलाफ है मातृभूमि की पूजा
इसके अलावा डॉ. इलियास का कहना है कि इस गाने के कुछ हिस्से मातृभूमि को एक देवी के रूप में दिखाते हैं और लोगों से उसकी पूजा करने का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार यह इस्लाम के ‘तौहीद’ यानी ईश्वर की पूर्ण एकता के बुनियादी सिद्धांत के बिल्कुल खिलाफ है। यही वजह है कि किसी भी मुसलमान को ऐसे गाने, नारे या किसी भी ऐसी प्रथा में शामिल होने के लिए मजबूर करना, जो उनके विश्वास के खिलाफ कोई धार्मिक अर्थ रखती हो, उनके लिए पूरी तरह से अस्वीकार्य है।
संविधान के आर्टिकल 25 और 19 का दिया गया हवाला
इस पूरे विवाद के बीच बोर्ड ने देश के संविधान के आर्टिकल 25 और 19 का भी हवाला दिया है। बोर्ड का कहना है कि ये अनुच्छेद नागरिकों के धर्म की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पूरी रक्षा करते हैं। इसमें किसी भी व्यक्ति की अंतरात्मा के खिलाफ जाने वाली अभिव्यक्तियों या गतिविधियों में शामिल न होने का अधिकार भी शामिल है। बयान में साफ शब्दों में कहा गया है कि इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों का स्पष्ट अर्थ यही है कि किसी भी नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा के खिलाफ जाकर किसी भी गाने, नारे, विचारधारा या प्रतीक को अपनाने या उसमें भाग लेने के लिए कभी मजबूर नहीं किया जा सकता है। अपनी बात के समर्थन में बोर्ड की तरफ से कई अन्य तर्क भी दिए गए हैं। अंत में उन्होंने कहा है कि एक मजबूत और एकजुट भारत तभी बन सकता है, जब देश के हर नागरिक को समान सम्मान, न्याय और पूरी आजादी मिले, और किसी की भी देशभक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के चश्मे से न परखा जाए।

