केंद्र सरकार के प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन बिल 2026 को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक ओर केंद्रीय मंत्री किरन रिजिजू ने ईसाई समुदाय को भरोसा दिलाया है कि इस कानून से किसी भी संस्था को नुकसान नहीं होगा, वहीं विपक्षी दलों ने इसे अल्पसंख्यकों, खासकर ईसाई समुदाय को निशाना बनाने वाला कदम बताया है।
केरल में चर्च नेताओं से मुलाकात के बाद रिजिजू ने कहा कि यह बिल केवल उन संगठनों के खिलाफ है जो अवैध तरीके से विदेशी फंड का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईमानदार एनजीओ और चर्च से जुड़े संस्थानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल बिल को रोक दिया गया है और इस पर आगे चर्चा की जाएगी।
वहीं विपक्ष ने इस बिल को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। डीएमके सांसद पी. विल्सन ने आरोप लगाया कि यह संशोधन ईसाई संस्थाओं और मिशनरियों को निशाना बनाने के उद्देश्य से लाया गया है। उनके अनुसार, ईस्टर जैसे समय पर इसे लाना समुदाय में डर का माहौल पैदा करता है। उन्होंने आशंका जताई कि इस बिल से चर्च, स्कूल और अस्पतालों जैसी संस्थाओं की संपत्तियों पर असर पड़ सकता है।
एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान विनियमन कानून में प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंड के उपयोग पर निगरानी को और सख्त करना है। सरकार का कहना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगेगी। साथ ही संदिग्ध संगठनों की जांच और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कार्रवाई आसान होगी।
विपक्ष ने इस प्रस्तावित कानून को 'ड्राकोनियन' यानी अत्यधिक कठोर बताया है। उनका कहना है कि यह कानून अल्पसंख्यकों की संस्थाओं को प्रभावित कर सकता है। इस मुद्दे को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन भी केंद्र सरकार के सामने चिंता जता चुके हैं।
सरकार का दावा है कि यह बिल किसी विशेष समुदाय को निशाना नहीं बनाता, बल्कि इसका उद्देश्य केवल पारदर्शिता सुनिश्चित करना और अवैध फंडिंग पर रोक लगाना है।
फिलहाल, इस बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव जारी है। रिजिजू ने संकेत दिया है कि चुनाव के बाद इस पर आगे चर्चा की जाएगी, जबकि विपक्ष इस मुद्दे पर लगातार हमलावर बना हुआ है।

