अमेरिका ने यूरोपीय संघ की नई कार्बन उत्सर्जन योजना को लेकर एक बार फिर चिंता जताई है। लंबी दूरी की उड़ान पर शुल्क के इस प्रस्ताव से भारत और ब्राजील समेत कई देश नाखुश हैं।
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अमेरिकी परिवहन विभाग ने कहा है कि वह यूरोपीय संघ की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के किसी भी विस्तार को लेकर "गहरी चिंता" में है। असल में यूरोपीय आयोग ने हाल में प्रस्ताव दिया है कि यूरोप से रवाना होने वाली कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर कार्बन उत्सर्जन शुल्क लागू किया जाएगा। यह यूरोप से उड़ान भरकर 5,000 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली फ्लाइटों पर लागू होगा।
2029 से लागू होने वाले इस कदम से जर्मनी, फ्रांस, इटली या डेनमार्क से रूस, सऊदी अरब, यूएई, तुर्की और मिस्र जाने वाली फ्लाइटें प्रभावित होंगी। हालांकि एक तरफ 5,000 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करने वाली उड़ानें इसके दायरे से बाहर रहेंगी। माना जा रहा है कि ईयू ने यह सीमा अमेरिका को नाराज ना करने के लिए रखी है। अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों के बीच हवाई दूरी 5,000 किलोमीटर से ज्यादा है। इसके साथ ही भारत, जापान और चीन से यूरोप पहुंचने वाली उड़ानों पर पहले चरण में इसका असर नहीं पड़ेगा।
यूरोपीय संघ के जलवायु कमिश्नर होप्के वोएकस्त्रा कहते हैं, "उड्डयन ही एकमात्र ऐसा बड़ा सेक्टर है, जिसमें उत्सर्जन घटने के बजाए बढ़ रहा है।" यूरोपीय अधिकारी के मुताबिक उत्सर्जन व्यापार प्रणाली से जुड़े शुल्क में प्राइवेट जेट और चार्टर्ड उड़ानें भी आएंगी।
यूरोपीय संघ 2012 से सभी इंटरनेशनल फ्लाइटों को ETS के दायरे में लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखा विरोध झेलना पड़ रहा है। यह विरोध अब भी जारी है। सोमवार को अमेरिका के परिवहन मंत्रालय के प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स के सामने ETS को लेकर गहरी चिंता जताई।
असल में यूरोपीय आयोग ने 17 जुलाई को ETS से जुड़े प्रस्ताव प्रकाशित किए। यह प्रस्ताव यूरोप से उड़ान भरने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को लेकर थे। इन प्रस्तावों के सामने आने के बाद अमेरिकी परिवहन मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "हम यूरोपीय आयोग के प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे हैं और हम अमेरिकी उपभोक्ताओं और कारोबारों को बचाने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं।" दोहरे मापदंडों के चलते घिरे दिग्गज जर्मन नेता का इस्तीफा
क्यों ETS का विस्तार चाहता है ईयू
यूरोपीय संघ को लगता है कि जलवायु को गर्म करने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए अगर संघ में कड़े नियम लागू किए जाते हैं, तो कई कंपनियां ईयू से बाहर निकलकर, करीबी पड़ोसी देशों में जा सकती हैं। इससे उत्सर्जन भी कम नहीं होगा और कंपनियां स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीक में निवेश करने के लिए भी प्रोत्साहित नहीं होंगी।
हालांकि ईयू के भीतर भी चेक गणराज्य, इटली और पोलैंड जैसे देश ETS का विरोध कर रहे हैं। इन देशों का कहना है कि इससे छोटे और मध्यम श्रेणी के उद्योगों व कारोबारों पर बेहताशा बोझ पड़ेगा जिससे वे बिखर सकते हैं।
वहीं आयोग का कहना है कि यूरोपीय संघ में परिवहन की वजह से होने वाला उत्सर्जन अभी कुल उत्सर्जन का 14 फीसदी है। यूरोपीय संघ के कुल सीओटू उत्सर्जन में एविएशन सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 4 फीसदी है। आयोग का कहना है कि अगर ETS जैसे कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक यह उत्सर्जन बढ़कर 90 फीसदी हो सकता है और इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार लंबी दूरी की उड़ानें होंगी। चैट जीपीटी के ज्यादा इस्तेमाल से दिमाग कमजोर होने का डर
विरोध करने वालों की साफ चेतावनियां
ईयू से बाहर के देशों ने चेतावनी दी है कि ETS अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और जहाजरानी उद्योग को प्रभावित करेगा। इसका सीधा असर यूरोपीय बंदरगाहों से निकलने वाले विमानों और मालवाहक जहाजों पर पड़ेगा। अमेरिका, चीन, तुर्की और यूएई जैसे देश ETS को अंतरराष्ट्रीय परिवहन समझौतों का उल्लंघन बता रहे हैं।
अमेरिका और अन्य कारोबारी साझेदार, यूरोपीय संघ को जवाबी कदमों की चेतावनी भी दे चुके हैं। ETS का विरोध कर रहे देशों का कहना है कि अगर यूरोपीय संघ कार्बन प्राइसिंग पॉलिसी पर आगे बढ़ा तो वे भी अपने उद्योगों को इसके वित्तीय बोझ से बचाएंगे।
ब्रिटेन के साथ साथ ETS को लेकर भारत और ब्राजील की भी आपत्तियां हैं। ब्राजील और भारत अंतरराष्ट्रीय सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेश (ICAO) के जरिए उड्डयन क्षेत्र में ETS का विरोध कर रहे हैं। दोनों देशों का आरोप है कि यूरोपीय देशों ने ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन किया है और अब जब उनका एविएशन सेक्टर विकास कर रहा है तो ब्रसेल्स उस पर बंदिशें लगाने की कोशिश कर रहा है।

