कई संकेत बताते हैं कि जुलाई तक उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर क्षेत्र में, एल नीन्यो प्रघटना विकसित हो जाएगी। उसका पूर्वानुमान लगाने की अपनी क्षमता को बेहतर बनाने के लिए, जलवायु वैज्ञानिक हर बार भूमध्य रेखा के पास प्रशांत महासागर के एक विशिष्ट आयताकार क्षेत्र की निगरानी करते हैं। यदि इस क्षेत्र में समुद्र की सतह के नीचे बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो जाता है, तो इसे एक प्रबल संकेत माना जाता है कि एल नीन्यो आने ही वाला है।
अगला एल नीन्यो कब आएगा?
अमेरिकी जलवायु एजेंसी NOAA (नैश्नल ओशियानिक ऐन्ड एटमॉस्फ़िरिक एडमिनिस्ट्रेशन) का कहना है, "जून और जुलाई 2026 के बीच एल नीन्यो के बनने योग्य परिस्थितियाँ विकसित होने की संभावना 82 प्रतिशत है- और सर्दियों के मौसम के लिए, यह संभावना बढ़कर 96 प्रतिशत तक पहुँच जाती है।" जर्मनी के कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (KIT) में मौसम विज्ञान के प्रोफेसर अंद्रेयास फिंक का कहना हैः "सभी कंप्यूटर मॉडल एक स्वर में, इस प्रघटना के विकसित होने की ओर ही संकेत करते हैं।" इस प्रकार- जैसा कि वैज्ञानिक पूर्वानुमानों में हमेशा कुछ अनिश्चितताएँ भी बनी रहती हैं- एल नीन्यो का शीघ्र ही आगमन, बहुत ही संभावित माना जा रहा है।
एल नीन्यो क्या है?
एल नीन्यो को पृथ्वी पर सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक जलवायु प्रघटना माना जाता है। उसे स्पेनी भाषा का यह नाम लैटिन (दक्षिण) अमेरिकी देश पेरू के मछुआरों ने दिया है। 19वीं सदी के आरंभ में ही, उन्होंने देखा कि कुछ खास वर्षों में, उनके तटवर्ती समुद्र का पानी असामान्य रूप से बहुत ज़्यादा गर्म हो जाता था, जिससे मछलियों का पकड़ा जाना वहाँ कम हो जाता था।
क्योंकि यह प्रघटना पेरू में दिसंबर महीने वाले क्रिसमस पर्व के आस-पास होती थी, इसलिए मछुआरों ने इस का नाम "एल नीन्यो" रखा- जो स्पेनिश भाषा में "लड़का" या "बालक ईसा" के लिए इस्तेमाल होता है। प्रघटना के दूसरे चरण को- जब समुद्री पानी अपेक्षाकृत ठंडा होता है- "ला नीन्या" (La Niña) अर्थात "लड़की" या "कन्या" कहा जाता है। ये दोनों चरण बारी-बारी से आते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे कोई पेंडुलम दायें-बायें झूलता है।
एल नीन्यो कितनी बार होता है?
एल नीन्यो लगभग हर दो से सात साल में लौटता है, और "सामान्य" स्थितियों को पूरी तरह से बदल देता है। भूमध्य रेखा के पास की तथाकथित व्यापारिक हवाएँ (trade winds) आमतौर पर सागर की सतह पर के गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलते हुए, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप से दूर ले जाती हैं। यह दिशा पृथ्वी के घूर्णन और तथाकथित "कोरिओलिस" बल से जुड़ी है। यह गर्म समुद्री पानी दक्षिण-पूर्व एशिया, ओशिनिया और ऑस्ट्रेलिया में बरसात का मौसम लाता है। इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका के तट के पास, समुद्र की गहराई से ऊपर उठ कर ठंडा पानी सतह पर आ जाता है; परिणामस्वरूप वहाँ स्थिति ठंडी और सूखी रहती है।
एल नीन्यो के दौरान क्या होता है?
एल नीन्यो के दौरान, व्यापारिक हवाएँ जब कमज़ोर पड़ जाती हैं या पूरी तरह से थम जाती हैं, तब यह जल-चक्र असंतुलित हो जाता है। जमा हुआ समुद्री गर्म पानी तेज़ी से दक्षिण अमेरिका के तट की ओर वापस बहने लगता है। इसके परिणामस्वरूप मूसलाधार वर्षा हो सकती है और बाढ़ आ सकती है। तब मछलियाँ भी ठंडे पानी की ओर चली जाती हैं। हालाँकि, प्रशांत महासागर के दूसरी तरफ़, गर्मी, सूखे और जंगलों में आग लगने का ख़तरा बढ़ जाता है। बहुत ही शक्तिशाली होने पर एल नीन्यो के प्रभाव भारत या दक्षिण अफ्रीका तक भी पहुँच सकते हैं।
प्रबल एल नीन्यो प्रघटनाएँ
एल नीन्यो प्रघटना की तीव्रता प्रशांत महासागर के मुख्य क्षेत्र में पानी के तापमान पर निर्भर करती है। "सामान्य" एल नीन्यो के दौरान, ये तापमान औसत से लगभग एक डिग्री सेल्सियस अधिक होते हैं। विशेष रूप से बहुत प्रबल प्रघटनाओं के दौरान- जैसा कि 1982, 1997 और 2015 में हुई प्रघटनाओं के समय हुआ- ये तापमान दो डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक तक पहुँच सकते हैं। पूर्वी जर्मनी में लाइपजिक विश्वविद्यालय के मौसम विज्ञान संस्थान के कार्स्टन हाउस्टाइन का इस संबंध में कहना है कि ठीक इस समय पढ़े गए तापमान "1997 में बने रिकॉर्ड के लगभग बराबर पहुँच गए हैं।"
सुपर या मेगा एल नीन्यो
एल नीन्यो आम तौर पर क्रिसमस के आस-पास अपने चरम पर पहुँचता है। इस समय, वैज्ञानिकों के ज़्यादातर मॉडल प्रशांत महासागर के पानी का तापमान औसत से दो डिग्री अधिक के निशान के आस-पास घूम रहा दिखाते हैं। परिणामस्वरूप, कहा जा सकता है कि 2015 के बाद अब हम संभवतः पुनः एक और "सुपर एल नीन्यो" का कटु अनुभव पाने के कगार पर हैं।
जर्मनी के कार्ल्सरूहे इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (KIT) में मौसम विज्ञान के प्रोफेसर अंद्रेयास फिंक का, जर्मन टेलीविज़न ARD को दिये एक इंटरव्यू में "सुपर" या "मेगा एल नीन्यो" जैसे शब्दों के बारे में कहना है, कि ऐसे शब्दों के बदले "वैज्ञानिकों के तौर पर, हम एक "मज़बूत" या "बहुत मज़बूत" अल नीन्यो की बात करना अधिक पसंद करते हैं।" ये वे श्रेणियाँ हैं जिनमें अमेरिकी जलवायु एजेंसी, NOAA भी अपने पूर्वानुमान तैयार करती है। 2026/27 का एल नीन्यो आखिरकार कितना प्रबल सिद्ध होगा, यह अभी भी अनिश्चित है। उसके "दुर्बल होने से लेकर बहुत प्रबल होने तक- सभी संभावनाएँ अभी भी बनी हुई हैं।" तब भी, एक काफ़ी ज़ोरदार प्रघटना होने के संकेत बढ़ रहे हैं- इसकी संभावना लगभग 60 प्रतिशत बताई जा रही है।
कौन से देश अधिक प्रभावित होते हैं?
एल नीन्यो का असर उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र और उसके आस-पास सबसे ज़्यादा दिखाई देता है। जर्मनी के मौसम विज्ञानी अंद्रेयास फिंक का कहना है कि दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर बसे इक्वाडोर और पेरू जैसे देशों को अभी से अपनी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। हालाँकि, ऐसी तैयारियों में हमेशा काफी पैसा खर्च होता है- ख़ासकर तब और अधिक, जब यह पक्का न हो कि अंततः क्या होने वाला है। यह ठीक-ठीक बता पाना, कि कौन सी भयानक घटनाएँ सचमुच घटित होंगी और कौन सी नहीं, बहुत ही मुश्किल काम है।
एल नीन्यो के मामले में, समुद्र के साथ-साथ वायुमंडल की, यानी हवा की भी एक निर्णायक भूमिका होती है; वायुमंडल का व्यवहार पानी से भी कहीं ज़्यादा जटिल होता है। जर्मन जलवायु वैज्ञानिक होस्टाइन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि "जहाँ एक तरफ समुद्र में होने वाले बदलावों का अनुमान अब काफी हद तक सटीकता के साथ लगाया जा सकता है, वहीं वायुमंडल के बारे में भरोसेमंद पूर्वानुमान लगाना अभी भी जल्दबाज़ी होगी।"
2026 के एल नीन्यो का असर कैसा होगा?
ऐसे पूर्वानुमान- जिन में यह भी शामिल हो कि इस बार एल नीन्यो वास्तव में कितना प्रबल होगा- गर्मियों के दौरान ज़्यादा सटीक होते जाते हैं। इतना तय है कि एल नीन्यो, वैश्विक औसत तापमान को और भी बढ़ा देगा, क्योंकि प्रशांत महासागर की वातावरण से गर्मी सोखने की क्षमता हो कम जाती है- जिससे औसत तापमान 0.1 से 0.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है।
मानवीय गतिविधियों से पृथ्वी पहले ही काफी गर्म हो चुकी है। इसका मतलब यह है कि वर्ष 2026 या 2027, वैश्विक तापमान रिकॉर्ड दर्ज करना शुरू होने के बाद से अब तक के सबसे गर्म वर्ष बन सकते हैं। 0.1 से 0.2 डिग्री ही सही, हर अतिरिक्त डिग्री-दशांस की वृद्धि गर्मी बढ़ने में- और तद्नुसार ऐसी अतिरिक्त ऊर्जा में बदलता जाता है, जो वैश्विक जलवायु प्रणाली के भीतर जमा होती जाती है।
गर्मी के रूप में निरंतर बढ़ती इस ऊर्जा का प्रभाव, लौट कर और भी ज़्यादा गंभीर किस्म की चरम मौसमी घटनाओं के रूप में हमारे ही सामने आता है। इन घटनाओं के जन्मदाता जलवायु परिवर्तन को रोकने, और प्राकृतिक आपदाओं को घटाने के लिए ज़रूरी है कि हम अपनी रहन-सहन और कार्यकलापों में कटौती करें। वर्ना, धरती पर हमारा बेरोक-टोक अविराम चौमुखी विकास, समय के साथ हमारे लिए ही आत्मघाती बनता जाएगा।

