या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
1. मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ
ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।
2. मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि
पूजा सामग्री:
फूल: माँ को पीले या सफेद रंग के फूल (जैसे चमेली या गेंदा) अत्यंत प्रिय हैं।
भोग: शक्कर (चीनी), मिश्री या पंचामृत।
वस्त्र: संभव हो तो पूजा के समय पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।
अन्य: चंदन, अक्षत, धूप, दीप और सुपारी।
पूजा विधि:
स्नान व शुद्धि: प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़क कर उसे पवित्र करें।
आवाहन व ध्यान: सबसे पहले कलश देवता और गणेश जी की पूजा करें। इसके बाद हाथ में फूल और अक्षत लेकर माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें।
पंचामृत स्नान: माँ की प्रतिमा या चित्र को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी का मिश्रण) से प्रतीकात्मक स्नान कराएं।
अर्पण: माँ को गंध, अक्षत, पीले फूल और सिंदूर अर्पित करें।
विशेष भोग: माँ ब्रह्मचारिणी को शक्कर या मिश्री का भोग लगाएं। मान्यता है कि इससे लंबी आयु और सौभाग्य का वरदान मिलता है।
कन्या भोज- इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का मंत्र:
पूजा मंत्र: "ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
बीज मंत्र- ह्रीं श्री अम्बिकाये नम:।
जप मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।
"ध्यान मंत्र:
दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
पूजा का समापन: अंत में माँ की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें। आरती के बाद प्रसाद को परिवार के सभी सदस्यों में बांट दें।
3. मां ब्रह्मचारिणी की आरती-lyrics
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।
4. मां ब्रह्मचारिणी व्रत की कथा
पूर्वजन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मी देवी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए नारद जी के उपदेश पर अत्यंत कठिन तपस्या की। हजारों वर्षों तक उन्होंने केवल फल, शाक और बाद में केवल सूखे बिल्व पत्र खाकर तप किया। अंत में उन्होंने अन्न-जल और पत्तों का भी त्याग कर दिया, जिस कारण वे 'अपर्णा' कहलाईं। उनकी इस अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं और ऋषियों ने उनकी सराहना की। ब्रह्मा जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनकी मनोकामना पूर्ण होगी और भगवान शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त होंगे।
कथा का मुख्य संदेश:
धैर्य और संकल्प: कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।
उपासना: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है, जो सर्व सिद्धि देने वाली हैं।
5. माता ब्रह्मचारिणी की चालीसा
।।दोहा।।
कोटि कोटि नमन मात पिता को, जिसने दिया ये शरीर।
बलिहारी जाऊँ गुरू देव ने, दिया हरि भजन में सीर।।
।।स्तुति।।
चन्द्र तपे सूरज तपे, और तपे आकाश।
इन सब से बढकर तपे, माताओं का सुप्रकाश।।
मेरा अपना कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥
पद्म कमण्डल अक्ष, कर ब्रह्मचारिणी रूप।
हंस वाहिनी कृपा करो, पडू नहीं भव कूप॥
जय जय श्री ब्रह्माणी, सत्य पुंज आधार।
चरण कमल धरि ध्यान में, प्रणबहुँ माँ बारम्बार॥
।।चौपाई।।
जय जय जग मात ब्रह्माणी, भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी।
वीणा पुस्तक कर में सोहे, शारदा सब जग सोहे ।।
हँस वाहिनी जय जग माता, भक्त जनन की हो सुख दाता।
ब्रह्माणी ब्रह्मा लोक से आई, मात लोक की करो सहाई।।
क्षीर सिन्धु में प्रकटी जब ही, देवों ने जय बोली तब ही।
चतुर्दश रतनों में मानी, अद॒भुत माया वेद बखानी।।
चार वेद षट शास्त्र कि गाथा, शिव ब्रह्मा कोई पार न पाता।
आदि शक्ति अवतार भवानी, भक्त जनों की मां कल्याणी।।
जब−जब पाप बढे अति भारी, माता शस्त्र कर में धारी।
पाप विनाशिनी तू जगदम्बा, धर्म हेतु ना करी विलम्बा।।
नमो: नमो: ब्रह्मी सुखकारी, ब्रह्मा विष्णु शिव तोहे मानी।
तेरी लीला अजब निराली, सहाय करो माँ पल्लू वाली।।
दुःख चिन्ता सब बाधा हरणी, अमंगल में मंगल करणी।
अन्न पूरणा हो अन्न की दाता, सब जग पालन करती माता।।
सर्व व्यापिनी असंख्या रूपा, तो कृपा से टरता भव कूपा।
चंद्र बिंब आनन सुखकारी, अक्ष माल युत हंस सवारी।।
पवन पुत्र की करी सहाई, लंक जार अनल सित लाई।
कोप किया दश कन्ध पे भारी, कुटुम्ब संहारा सेना भारी।।
तु ही मात विधी हरि हर देवा, सुर नर मुनी सब करते सेवा।
देव दानव का हुआ सम्वादा, मारे पापी मेटी बाधा।।
श्री नारायण अंग समाई, मोहनी रूप धरा तू माई।।
देव दैत्यों की पंक्ति बनाई, देवों को मां सुधा पिलाई।।
चतुराई कर के महा माई, असुरों को तू दिया मिटाई।
नौ खण्ङ मांही नेजा फरके, भागे दुष्ट अधम जन डर के।।
तेरह सौ पेंसठ की साला, आस्विन मास पख उजियाला।
रवि सुत बार अष्टमी ज्वाला, हंस आरूढ कर लेकर भाला।।
नगर कोट से किया पयाना, पल्लू कोट भया अस्थाना।
चौसठ योगिनी बावन बीरा, संग में ले आई रणधीरा।।
बैठ भवन में न्याय चुकाणी, द्वारपाल सादुल अगवाणी।
सांझ सवेरे बजे नगारा, उठता भक्तों का जयकारा।।
मढ़ के बीच खड़ी मां ब्रह्माणी, सुन्दर छवि होंठो की लाली।
पास में बैठी मां वीणा वाली, उतरी मढ़ बैठी महाकाली ।।
लाल ध्वजा तेरे मंदिर फरके, मन हर्षाता दर्शन करके।
दूर दूर से आते रेला, चैत आसोज में लगता मेला।।
कोई संग में, कोई अकेला, जयकारो का देता हेला।
कंचन कलश शोभा दे भारी, दिव्य पताका चमके न्यारी।।
सीस झुका जन श्रद्धा देते, आशीष से झोली भर लेते।
तीन लोकों की करता भरता, नाम लिए सब कारज सरता।।
मुझ बालक पे कृपा कीज्यो, भुल चूक सब माफी दीज्यो।
मन्द मति जय दास तुम्हारा, दो मां अपनी भक्ती अपारा।।
जब लगि जिऊ दया फल पाऊं, तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊं।
श्री ब्रह्माणी चालीसा जो कोई गावे, सब सुख भोग परम सुख पावे।।
।।दोहा।।
राग द्वेष में लिप्त मन, मैं कुटिल बुद्धि अज्ञान।
भव से पार करो मातेश्वरी, अपना अनुगत जान॥
7. मां ब्रह्मचारिणी पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. माँ ब्रह्मचारिणी का अर्थ क्या है?
'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। अतः ब्रह्मचारिणी का अर्थ है- तप का आचरण करने वाली देवी।
2. नवरात्रि के किस दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है?
नवरात्रि के दूसरे दिन (द्वितीय तिथि) को माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है।
3. माँ का स्वरूप कैसा है?
माँ ब्रह्मचारिणी अत्यंत शांत और सौम्य स्वरूप में हैं। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है।
4. माँ ब्रह्मचारिणी को कौन सा भोग प्रिय है?
माँ को शक्कर (चीनी), मिश्री और पंचामृत का भोग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि इसका भोग लगाने से साधक को लंबी आयु और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
5. पूजा में किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है?
माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ और शांतिदायक माना जाता है।
6. देवी को 'अपर्णा' क्यों कहा जाता है?
कठोर तपस्या के दौरान जब देवी ने जीवित रहने के लिए सूखे पत्तों (बिल्व पत्र) को खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम 'अपर्णा' (बिना पत्तों के रहने वाली) पड़ा।
7. इस स्वरूप की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से व्यक्ति के भीतर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। यह पूजा मन को स्थिर करने और कठिन समय में विचलित न होने की शक्ति प्रदान करती है।
8. माँ ब्रह्मचारिणी का सबसे प्रिय पुष्प कौन सा है?
माँ को सुगंधित पुष्प प्रिय हैं, विशेष रूप से चमेली का फूल उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है।

