या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
1. मां चंद्रघंटा का अर्थ
2. मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
3. मां चंद्रघंटा की आरती-lyrics
4. मां चंद्रघंटा व्रत की कथा
5. माता शैल पुत्री की चालीसा
6. मां चंद्रघंटा की पूजा का लाभ
7. मां चंद्रघंटा पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. मां चंद्रघंटा का अर्थ
ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार चंद्रघंटा का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।
2. मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
पूजा सामग्री:
फूल: माँ को सफेद रंग के फूल (जैसे चमेली या गेंदा) अत्यंत प्रिय हैं।
भोग: शक्कर (चीनी), मिश्री या पंचामृत।
वस्त्र: संभव हो तो पूजा के समय पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।
अन्य: चंदन, अक्षत, धूप, दीप और सुपारी।
पूजा विधि:
1. तैयारी और संकल्प
रंग: माता चंद्रघंटा को सुनहरा (Golden) या भूरा (Brown) रंग अत्यंत प्रिय है। संभव हो तो इसी रंग के वस्त्र पहनें।
समय: ब्रह्म मुहूर्त या सुबह के समय पूजा करना उत्तम है।
शुद्धि: स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मंदिर या पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
2. पूजन विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)
आह्वान: सबसे पहले कलश देवता और गणेश जी की पूजा करें। इसके बाद हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर मां चंद्रघंटा का ध्यान करें।
स्नान और श्रृंगार: माता की मूर्ति या तस्वीर को गंगाजल से स्नान कराएं। उन्हें सिंदूर, अक्षत, गंध, धूप और दीप अर्पित करें।
पुष्प अर्पण: माता को सफेद कमल या लाल गुलाब के फूल अर्पित करना बहुत शुभ माना जाता है।
विशेष भोग: मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई (जैसे खीर या खोये की बर्फी) का भोग लगाएं। उन्हें शहद का भोग लगाना भी विशेष फलदायी होता है।
3. मंत्र जाप
पूजा के दौरान इस मंत्र का उच्चारण करें:
"पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥"
या सरल मंत्र:
"ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः"
4. आरती और क्षमा प्रार्थना
अंत में मां चंद्रघंटा की आरती गाएं और कपूर से आरती करें।
पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें और अपने परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद मांगें।
माता चंद्रघंटा की पूजा का महत्व
भय का नाश: इनकी कृपा से जातक को हर प्रकार के भय (डर) से मुक्ति मिलती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
सौम्यता और विनम्रता: माता का यह रूप शांतिदायक है, जो क्रोध को शांत कर मन में सौम्यता लाता है।
ग्रह शांति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा से शुक्र ग्रह (Venus) मजबूत होता है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है।
3. मां चंद्रघंटा की आरती-lyrics
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।
4. मां चंद्रघंटा व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा था। उस काल में महिषासुर का भयंकर युद्ध देवताओं से हो रहा था। महिषासुर देवराज देवलोक को अपने कब्जे में लेना चाहता था। जब देवताओं को उसकी इस इच्छा का पता चला तो वे विचलिता हो गए। सभी देवता भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समक्ष पहुंचे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने देवताओं की बात सुन क्रोध प्रकट किया। क्रोध आने पर उन तीनों के मुख से ऊर्जा निकली। उस ऊर्जा से एक देवी अवतरित हुईं। उस देवी को भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल, भगवान विष्णु ने अपना चक्र, इंद्र ने अपना घंटा दिया। सूर्य ने अपना तेज और तलवार और सिंह प्रदान किया। इसके बाद मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का वध कर देवताओं की रक्षा की।
5. माता चंद्रघंटा की चालीसा
।।दोहा।।
कोटि कोटि नमन मात पिता को, जिसने दिया ये शरीर।
बलिहारी जाऊँ गुरू देव ने, दिया हरि भजन में सीर।।
।।स्तुति।।
चन्द्र तपे सूरज तपे, और तपे आकाश।
इन सब से बढकर तपे, माताओं का सुप्रकाश।।
मेरा अपना कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥
पद्म कमण्डल अक्ष, कर चंद्रघंटा रूप।
हंस वाहिनी कृपा करो, पडू नहीं भव कूप॥
जय जय श्री ब्रह्माणी, सत्य पुंज आधार।
चरण कमल धरि ध्यान में, प्रणबहुँ माँ बारम्बार॥
।।चौपाई।।
जय जय जग मात ब्रह्माणी, भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी।
वीणा पुस्तक कर में सोहे, शारदा सब जग सोहे ।।
हँस वाहिनी जय जग माता, भक्त जनन की हो सुख दाता।
ब्रह्माणी ब्रह्मा लोक से आई, मात लोक की करो सहाई।।
क्षीर सिन्धु में प्रकटी जब ही, देवों ने जय बोली तब ही।
चतुर्दश रतनों में मानी, अद॒भुत माया वेद बखानी।।
चार वेद षट शास्त्र कि गाथा, शिव ब्रह्मा कोई पार न पाता।
आदि शक्ति अवतार भवानी, भक्त जनों की मां कल्याणी।।
जब−जब पाप बढे अति भारी, माता शस्त्र कर में धारी।
पाप विनाशिनी तू जगदम्बा, धर्म हेतु ना करी विलम्बा।।
नमो: नमो: ब्रह्मी सुखकारी, ब्रह्मा विष्णु शिव तोहे मानी।
तेरी लीला अजब निराली, सहाय करो माँ पल्लू वाली।।
दुःख चिन्ता सब बाधा हरणी, अमंगल में मंगल करणी।
अन्न पूरणा हो अन्न की दाता, सब जग पालन करती माता।।
सर्व व्यापिनी असंख्या रूपा, तो कृपा से टरता भव कूपा।
चंद्र बिंब आनन सुखकारी, अक्ष माल युत हंस सवारी।।
पवन पुत्र की करी सहाई, लंक जार अनल सित लाई।
कोप किया दश कन्ध पे भारी, कुटुम्ब संहारा सेना भारी।।
तु ही मात विधी हरि हर देवा, सुर नर मुनी सब करते सेवा।
देव दानव का हुआ सम्वादा, मारे पापी मेटी बाधा।।
श्री नारायण अंग समाई, मोहनी रूप धरा तू माई।।
देव दैत्यों की पंक्ति बनाई, देवों को मां सुधा पिलाई।।
चतुराई कर के महा माई, असुरों को तू दिया मिटाई।
नौ खण्ङ मांही नेजा फरके, भागे दुष्ट अधम जन डर के।।
तेरह सौ पेंसठ की साला, आस्विन मास पख उजियाला।
रवि सुत बार अष्टमी ज्वाला, हंस आरूढ कर लेकर भाला।।
नगर कोट से किया पयाना, पल्लू कोट भया अस्थाना।
चौसठ योगिनी बावन बीरा, संग में ले आई रणधीरा।।
बैठ भवन में न्याय चुकाणी, द्वारपाल सादुल अगवाणी।
सांझ सवेरे बजे नगारा, उठता भक्तों का जयकारा।।
मढ़ के बीच खड़ी मां ब्रह्माणी, सुन्दर छवि होंठो की लाली।
पास में बैठी मां वीणा वाली, उतरी मढ़ बैठी महाकाली ।।
लाल ध्वजा तेरे मंदिर फरके, मन हर्षाता दर्शन करके।
दूर दूर से आते रेला, चैत आसोज में लगता मेला।।
कोई संग में, कोई अकेला, जयकारो का देता हेला।
कंचन कलश शोभा दे भारी, दिव्य पताका चमके न्यारी।।
सीस झुका जन श्रद्धा देते, आशीष से झोली भर लेते।
तीन लोकों की करता भरता, नाम लिए सब कारज सरता।।
मुझ बालक पे कृपा कीज्यो, भुल चूक सब माफी दीज्यो।
मन्द मति जय दास तुम्हारा, दो मां अपनी भक्ती अपारा।।
जब लगि जिऊ दया फल पाऊं, तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊं।
श्री ब्रह्माणी चालीसा जो कोई गावे, सब सुख भोग परम सुख पावे।।
।।दोहा।।
राग द्वेष में लिप्त मन, मैं कुटिल बुद्धि अज्ञान।
भव से पार करो मातेश्वरी, अपना अनुगत जान॥
1. माँ चंद्रघंटा का अर्थ क्या है?
'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। अतः चंद्रघंटा का अर्थ है- तप का आचरण करने वाली देवी।
2. नवरात्रि के किस दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है?
नवरात्रि के दूसरे दिन (द्वितीय तिथि) को माँ चंद्रघंटा की पूजा का विधान है।
3. माँ का स्वरूप कैसा है?
माँ चंद्रघंटा अत्यंत शांत और सौम्य स्वरूप में हैं। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है।
4. माँ चंद्रघंटा को कौन सा भोग प्रिय है?
माँ को शक्कर (चीनी), मिश्री और पंचामृत का भोग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि इसका भोग लगाने से साधक को लंबी आयु और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
5. पूजा में किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है?
माँ चंद्रघंटा की पूजा के लिए सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ और शांतिदायक माना जाता है।
6. देवी को 'अपर्णा' क्यों कहा जाता है?
कठोर तपस्या के दौरान जब देवी ने जीवित रहने के लिए सूखे पत्तों (बिल्व पत्र) को खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम 'अपर्णा' (बिना पत्तों के रहने वाली) पड़ा।
7. इस स्वरूप की पूजा से क्या लाभ मिलता है?
माँ चंद्रघंटा की कृपा से व्यक्ति के भीतर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। यह पूजा मन को स्थिर करने और कठिन समय में विचलित न होने की शक्ति प्रदान करती है।
8. माँ चंद्रघंटा का सबसे प्रिय पुष्प कौन सा है?
माँ को सुगंधित पुष्प प्रिय हैं, विशेष रूप से चमेली का फूल उन्हें अत्यंत प्रिय माना जाता है।

