नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कूष्मांड के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कूष्मांड नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत् हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
1. मां कूष्मांडा का अर्थ
नवरात्रि के चौथे दिन की देवी कूष्मांडा है। पनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कूष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है।
2. मां कूष्मांडा की पूजा विधि
- इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का प्रयोग करना बेहतर होता है।
- देवी को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करना चाहिए।
- मां कूष्मांडा को इस निवेदन के साथ जल पुष्प अर्पित करें कि, उनके आशीर्वाद से आपका और आपके स्वजनों का स्वास्थ्य अच्छा रहे।
- अगर आपके घर में कोई लंबे समय से बीमार है तो इस दिन मां से खास निवेदन कर उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करनी चाहिए।
- देवी को पूरे मन से फूल, धूप, गंध, भोग चढ़ाएं।
- मां कूष्मांडा को विविध प्रकार के फलों का भोग अपनी क्षमतानुसार लगाएं।
- पूजा के बाद अपने से बड़ों को प्रणाम कर प्रसाद वितरित करें।
- माता कूष्मांडा को मालपुआ, नाशपाती या हलवे का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए।
कूष्मांडा देवी का मंत्र:
श्लोक
सुरासंपूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥
सरलतम मंत्र यह है-
'ॐ कूष्माण्डायै नम:।।'
मां कूष्मांडा की उपासना का मंत्र-
देवी कूष्मांडा की उपासना इस मंत्र के उच्चारण से की जाती है- कूष्मांड: ऐं ह्री देव्यै नम:
वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
मंत्र: या देवि सर्वभूतेषू सृष्टि रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
3. मां कूष्मांडा की आरती-lyrics
।।माँ कूष्माण्डा की आरती।।
कुष्माण्डा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकम्भरी माँ भोली भाली॥
लाखों दीप तुम्हारे राजें।
तिहुं लोक में डंका बाजें॥
शुद्ध मन से जो तुझे ध्यावे।
अंत काल पदवी वह पावे॥
चौथा स्वरूप तुम्हारा माता।
सुख पाता जो तुम्हें मनाता॥
अष्टभुजी माँ शक्ति वाली।
मिटाती सबकी विपदा काली॥
सूर्य लोक की तुम महारानी।
सब जग करता तुम्हारी महिमा बखानी॥
मालपुआ का भोग लगाओ।
माँ को श्रद्धा से मनाओ॥
शुक्रवार को जो ध्यान लगावे।
मनवांछित फल माँ से पावे॥
कुष्माण्डा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
(समाप्त)
4. मां कूष्मांडा व्रत की कथा
नवरात्रि की चतुर्थ देवी कूष्मांडा माता की कथा के अनुसार जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी तब उस समय चारों ओर अंधकार था। देवी कूष्मांड जिनका मुखमंडल सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई। उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गई और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान माता की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मांड का जन्म हुआ। अतः यह देवी कूष्माण्डा के रूप में विख्यात हुई।
5. माता कूष्मांडा की चालीसा
॥ श्री कूष्मांडा चालीसा ॥
॥दोहा॥
माता कुष्मांडा की जय, करुणा की सागर।
सुख-सम्पत्ति देने वाली, जय माँ, जय अंबर॥
जयति जयति जगत की माता।
कुष्मांडा देवी सुखदायी भ्राता॥
शुम्भ-निशुम्भ हरणी माता।
भक्तों की विपदा हरणी भ्राता॥
कुश (कुमार) मंद हर्ष से भरी।
चारों ओर कृपा की झरी॥
हंस पर सवार हे माता।
कृपा का अविरल बहाता॥
कुम्भ करों में जल से भरे।
धन-धान्य से भरे सारे घर॥
आभा से दीप्त हे माता।
भक्तों के संकट मिटाता॥
चतुर्थी तिथि शुभ कहलाती।
व्रत रखने से सब सफल होती॥
मंत्र का जप करों हे प्यारे।
जीवन सुखी हो जाए सारे॥
अंत में सुन लो अरज हमारी।
जीवन सवारे भवसागर से॥
जय माता कुष्मांडा भवानी।
कृपा करो हे जगत की रानी॥
॥ इति श्री कुष्मांडा चालीसा सम्पूर्ण ॥
6. मां कूष्मांडा की पूजा का लाभ
- देवी कुष्मांडा की पूजा और भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।
- माता कूष्मांडा को मालपुए का भोग लगाकर दान देने से हर प्रकार का विघ्न दूर हो जाता है।
- माँ कूष्मांड की भक्ति से वे भक्तों के मानसिक और शारीरिक कष्टों को दूर करती हैं।
- इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ और ऊर्जादायक माना जाता है।
7. मां कूष्मांडा पर पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs
1. "कूष्मांड" शब्द का अर्थ क्या है?
"कूष्मांड" शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है: 'कु' (छोटा), 'ऊष्मा' (ऊर्जा/ताप), 'अंडा' (ब्रह्मांडीय गोला)। इसका अर्थ है- वह देवी जिन्होंने अपनी मंद मुस्कान से 'ब्रह्मांड' रूपी छोटे अंडे को उत्पन्न किया।
2. माँ कूष्मांड को ब्रह्मांड की आदि-शक्ति क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल अंधकार था, तब माँ कूष्मांड ने अपनी ईषत् मुस्कान (हल्की हंसी) से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदि-स्वरूपा या आदि-शक्ति माना जाता है।
3. माँ कूष्मांड का स्वरूप कैसा है?
उनकी आठ भुजाएँ हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहते हैं।
उनके हाथों में धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत-कलश, चक्र, गदा और जप माला रहती है।
वे सिंह पर सवार रहती हैं, जो तेज और साहस का प्रतीक है।
4. माँ कूष्मांड का निवास स्थान कहाँ माना जाता है?
वे सौरमंडल के भीतर के लोक में निवास करती हैं। केवल उनमें ही सूर्य के समान तेज को सहने की क्षमता है, और उनकी आभा से ही दसों दिशाएँ आलोकित होती हैं।
5. माँ को प्रसन्न करने के लिए किसका भोग लगाया जाता है?
माँ कूष्मांड को मालपुआ बहुत प्रिय है। इसके अलावा, उन्हें कुम्हड़ा (पेठा या कोहड़ा) भी अर्पित किया जाता है, क्योंकि संस्कृत में कुम्हड़े को 'कूष्मांड' कहा जाता है।
6. इनकी पूजा से भक्तों को क्या फल मिलता है?
माँ कूष्मांड की भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य (अच्छे स्वास्थ्य) की वृद्धि होती है। वे भक्तों के मानसिक और शारीरिक कष्टों को दूर करती हैं।

