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Mohini Ekadashi Katha 2026: मोहिनी एकादशी के रहस्य, जानें पौराणिक व्रत कथा और लाभ

Mohini Ekadashi Katha 2026: मोहिनी एकादशी के रहस्य, जानें पौराणिक व्रत कथा और लाभ

Mohini Ekadashi Katha: हिंदू धर्म में एकादशी का विशेष महत्व है और इनमें से मोहिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र व्रत है। यह व्रत न केवल पापों के नाश और पुण्य की वृद्धि करता है, बल्कि संतान सुख, वैवाहिक सुख और जीवन में समृद्धि भी लाता है।

मोहिनी एकादशी वैशाख मास में मनाई जाती है और इसे भक्त भक्ति, उपवास और पूजा के माध्यम से मनाते हैं। इस दिन भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और रातभर भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहते हैं।

आइए यहां जानते हैं मोहिनी एकादशी व्रत कथा...

मोहिनी एकादशी पौराणिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा:

मोहिनी एकादशी की कथा के अनुसार सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी में द्युतिमान नामक चंद्रवंशी राजा राज करता था। वहां धन-धान्य से संपन्न व पुण्यवान धनपाल नामक वैश्य भी रहता है। वह अत्यंत धर्मालु और विष्णु भक्त था। उसने नगर में अनेक भोजनालय, प्याऊ, कुएं, सरोवर, धर्मशाला आदि बनवाए थे। सड़कों पर आम, जामुन, नीम आदि के अनेक वृक्ष भी लगवाए थे। उसके पांच पुत्र थे- सुमना, सद्‍बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि।

इनमें से पांचवां पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह पितर आदि को नहीं मानता था। वह वेश्या, दुराचारी मनुष्यों की संगति में रहकर जुआ खेलता और पर-स्त्री के साथ भोग-विलास करता तथा मद्य-मांस का सेवन करता था। इसी प्रकार अनेक कुकर्मों में वह पिता के धन को नष्ट करता रहता था। इन्हीं कारणों से त्रस्त होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया था। घर से बाहर निकलने के बाद वह अपने गहने-कपड़े बेचकर अपना निर्वाह करने लगा। जब सबकुछ नष्ट हो गया तो वेश्या और दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया। अब वह भूख-प्यास से अति दुखी रहने लगा।

कोई सहारा न देख चोरी करना सीख गया। एक बार वह पकड़ा गया तो वैश्य का पुत्र जानकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मगर दूसरी बार फिर पकड़ में आ गया। राजाज्ञा से इस बार उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में उसे अत्यंत दु:ख दिए गए। बाद में राजा ने उसे नगरी से निकल जाने का कहा। वह नगरी से निकल वन में चला गया। वहां वन्य पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। कुछ समय पश्चात वह बहेलिया बन गया और धनुष-बाण लेकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर वह खाने की तलाश में घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुंच गया। उस समय वैशाख मास था और ऋषि गंगा स्नान कर आ रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे कुछ सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई।

वह कौडिन्य मुनि से हाथ जोड़कर कहने लगा कि हे मुने! मैंने जीवन में बहुत पाप किए हैं। आप इन पापों से छूटने का कोई साधारण बिना धन का उपाय बताइए। उसके दीन वचन सुनकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम वैशाख शुक्ल की मोहिनी नामक एकादशी का व्रत करने की सलाह दी, जिससे कि उसके समस्त पाप नष्ट हो जाए।

मुनि के वचन सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ पर बैठकर विष्णुलोक को गया।

मान्यातानुसार मोहिनी एकादशी के माहात्म्य और कथा पढ़ने अथवा सुनने से एक हजार गौ दान का फल प्राप्त होता है। इस व्रत करने से मोह, माया, लालच आदि सभी तरह के पाप नष्ट होते हैं। इस व्रत से श्रेष्ठ संसार में कोई व्रत नहीं है।

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