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फिल्म समीक्षा
ओके जानू : फिल्म समीक्षा

भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता है और यह रिश्ता सिर्फ मेट्रो सिटीज़ में ही नजर आता है। लिव-इन रिलेशनशिप पर कुछ फिल्में बनी हैं और मणिरत्नम के शिष्य शाद अली ने एक और प्रयास 'ओके जानू' के रूप में किया है। यह 2015 में प्रदर्शित फिल्म 'ओ कधल कनमनी' का हिंदी रिमेक है।

लिव इन रिलेशनशिप में लड़का-लड़की साथ रहते हैं। दोनों का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना जरूरी है। खर्चा आधा-आधा बंटता है। किसी किस्म की प्रतिबद्धता या वायदा नहीं होता है। कोई किसी पर हक नहीं जमाता। प्यार कम और शारीरिक आकर्षण ज्यादा रहता है। प्यार के अभाव में यह रिश्ता ज्यादा चल नहीं पाता। यदि प्यार होता है तो इस रिश्ते की अगली मंजिल शादी होती है।

'ओके जानू' में लेखक मणिरत्नम ने दर्शाने की कोशिश की है कि कोई भी रिश्ता हो उसमें प्यार जरूरी है। शारीरिक आकर्षण भी ज्यादा देर तक बांध कर नहीं रख सकता। फिल्म में दो जोड़ियां हैं। आदि (आदित्य रॉय कपूर) और तारा (श्रद्धा कपूर) युवा हैं, शादी को मूर्खता समझते हैं। दूसरी जोड़ी गोपी (नसीरुद्दीन शाह) और उनकी पत्नी चारू (लीला सैमसन) की है। दोनों वृद्ध हैं। शादी को लगभग पचास बरस होने आए। शादी के इतने वर्ष बाद भी दोनों का नि:स्वार्थ प्रेम देखते ही बनता है।

गोपी के यहां आदि और तारा पेइंग गेस्ट के रूप में रहते हैं। इन दोनों जोड़ियों के जरिये तुलना की गई है। एक तरफ गोपी और उनकी पत्नी हैं जिनमें प्यार की लौ वैसी ही टिमटिमा रही है जैसी वर्षों पूर्व थी। दूसरी ओर आदि और तारा हैं, जो प्यार और शादी को आउट ऑफ फैशन मानते हैं और करियर से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं है। फिल्म के आखिर में दर्शाया गया है कि प्यार कभी आउट ऑफ फैशन नहीं हो सकता है।

फिल्म की कहानी में ज्यादा उतार-चढ़ाव या घुमाव-फिराव नहीं है। बहुत छोटी कहानी है। कहानी में आगे क्या होने वाला है यह भी अंदाजा लगना मुश्किल नहीं है। इसके बावजूद फिल्म बांध कर रखती है इसके प्रस्तुति के कारण। निर्देशक शाद अली ने आदि और तारा के रोमांस को ताजगी के साथ प्रस्तुत किया है। इस रोमांस के बूते पर ही वे फिल्म को शानदार तरीके से इंटरवल तक खींच लाए। आदि और तारा के रोमांस के लिए उन्होंने बेहतरीन सीन रचे हैं।

इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ी लड़खड़ाती है। दोहराव का शिकार हो जाती है। कुछ अनावश्यक दृश्य नजर आते हैं, लेकिन बोर नहीं करती। कुछ ऐसे दृश्य आते हैं जो फिल्म को संभाल लेते हैं। फिल्म के संवाद, एआर रहमान-गुलजार के गीत-संगीत की जुगलबंदी, मुंबई के खूबसूरत लोकेशन्स, आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर की केमिस्ट्री मनोरंजन के ग्राफ को लगातार ऊंचा रखने में मदद करते हैं।

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निर्देशक के रूप में शाद प्रभावित करते हैं। ऐसी फिल्मों में जहां कहानी का बहुत ज्यादा साथ नहीं मिलता है, स्क्रीन पर क्या दिखाया जाए, के लिए निर्देशक को बहुत मेहनत करना होती है। शाद ने अच्छी तरह से अपना काम किया है। वे फिल्म को थोड़ा छोटा रखते तो उनका काम और भी बेहतर होता।

आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर की जोड़ी अच्छी लगती है। एक बेफिक्र रहने वाले युवा की भूमिका आदित्य ने अच्छे से निभाई है। श्रद्धा कपूर को निर्देशक ने कुछ कठिन दृश्य दिए हैं और इनमें वे अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं। बुजुर्ग दंपत्ति के रूप में नसीरुद्दीन शाह और लीला सैमसन अच्‍छे लगे हैं।

'ओके जानू' की कहानी में नई बात नहीं है, लेकिन आदि-तारा का रोमांस और शाद अली का प्रस्तुतिकरण फिल्म में दिलचस्पी बनाए रखता है।


बैनर : मद्रास टॉकीज़, फॉक्स स्टार स्टुडियोज़, धर्मा प्रोडक्शन्स

निर्माता : मणि रत्नम, करण जौहर

निर्देशक : शाद अली

संगीत : एआर रहमान

कलाकार : श्रद्धा कपूर, आदित्य रॉय कपूर, नसीरुद्दीन शाह, लीला सैमसन

सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 17 मिनट

रेटिंग : 3/5

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