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Ram Navami: रामनवमी पर श्रीराम की पूजा विधि, आरती, मंत्र, चालीसा, कथा और लाभ

Ram Navami: रामनवमी पर श्रीराम की पूजा विधि, आरती, मंत्र, चालीसा, कथा और लाभ

Shri Ram Aarti: मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम विष्णु के दशावतारों में से सातवें अवतार हैं। चैत्र माह की नवमी पर राम नवमी के दिन उनका पूजन, मंत्र, स्तुति, चालीसा, आरती, रामाष्टक आदि का पाठ करने से मनुष्य जीवन के भवसागर से पार पा जाते हैं, अत: हर मनुष्य को प्रतिदिन प्रभु श्रीराम की स्तुति करना चाहिए।

यदि आप हर दिन यह पाठ नहीं कर पा रहे हैं तो राम नवमी के दिन अवश्‍य ही पढ़ना चाहिए।

1. श्रीराम की पूजा

संकल्प और स्नान: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करें और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। आज का दिन प्रभु के बालरूप की सेवा का है।

जन्मोत्सव का समय: ठीक दोपहर 12 बजे, जब सूर्य अपने शिखर पर होता है, प्रभु राम का जन्म हुआ था। इसी समय रामलला को सुंदर झूले में विराजमान करें और श्रृंगार करें।

कलश स्थापना: चावल की ढेरी पर तांबे का कलश स्थापित करें। कलश में आम के पत्ते, नारियल और सुपारी रखें। इसके चारों ओर चौमुखी दीपक प्रज्वलित करें जो चारों दिशाओं से अंधकार को दूर करे।

अर्घ्य और अर्पण: प्रभु को कमल का फूल, तुलसी दल (जो उन्हें अत्यंत प्रिय है), पंचामृत, ताजे फल और फूलों की माला अर्पित करें।

स्तुति: नैवेद्य (भोग) लगाने के बाद श्रद्धापूर्वक विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। यह मन को अगाध शांति प्रदान करता है।

विशेष प्रसाद: रामनवमी पर पंजीरी (पिसे हुए धनिये में गुड़ या शक्कर मिला हुआ मिश्रण) और पंचामृत का विशेष महत्व है। इसे बनाकर सभी में वितरित करें।

सलाह: रामनवमी केवल व्रत रखने का दिन नहीं है, बल्कि श्रीराम के धैर्य और उनके मर्यादित चरित्र को अपने भीतर उतारने का संकल्प लेने का दिन है।

2. श्रीराम जी की आरती

।। श्री रामजी की आरती ।।

आरती कीजै श्री रघुवर जी की,

सतचित आनंद शिव सुंदर की,

दशरथ तनय कौशल्या नंदन,

सुर, मुनि, रक्षक, दैत्य निकंदन,

अनुगत भक्त-भक्त उर चंदन,

मर्यादा पुरुषोत्तम वर की,

आरती कीजे श्री.......

निर्गुण, सगुण, अनूप रूप निधि,

सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि,

हरण शोक भयदायक नवनिधि,

माया रहित दिव्य नर वर की,

आरती कीजै श्री.......

जानकी पति सुर अधिपति जगपति,

अखिल लोक पालक त्रिलोक गति,

विश्व बंध अवंनह अमित गति,

एक मात्र गति सचराचर की,

आरती कीजै श्री.........

शरणागति वत्सल व्रतधारी,

भक्त कल्प तरुवर असुरारी,

नाम लेत जग पावन कारी,

वानर सखा दीन दुःख हर की,

आरती कीजै श्री......

3. श्रीराम का मंत्र

  • 'श्री राम जय राम जय जय राम'
  • 'ॐ रामभद्राय नम:'
  • 'ॐ नमो भगवते रामचंद्राय'
  • 'ॐ रामचंद्राय नम:'

4. श्रीराम जी की चालीसा

।। श्री राम चालीसा ।।

।। चौपाई ।।

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥

दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥

तुम अनाथ के नाथ गुंसाई। दीनन के हो सदा सहाई॥

ब्रह्मादिक तव पारन पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥

चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखीं॥

गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥

नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥

राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥

शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥

फूल समान रहत सो भारा। पाव न कोऊ तुम्हरो पारा॥

भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुं न रण में हारो॥

नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥

ताते रण जीते नहिं कोई। युद्घ जुरे यमहूं किन होई॥

महालक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥

सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥

घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥

सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्घि चरणन में लोटत॥

सिद्घि अठारह मंगलकारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥

औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥

इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥

जो तुम्हे चरणन चित लावै। ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। नर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥

सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं॥

सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥

तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥

जो कुछ हो सो तुम ही राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥

राम आत्मा पोषण हारे। जय जय दशरथ राज दुलारे॥

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुम ही हो हमरे तन मन धन॥

याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिर मेरा॥

और आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावे सोई॥

तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥

साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्घता पावै॥

अन्त समय रघुबरपुर जाई। जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥

श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥

॥ दोहा॥

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।

हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।

जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥

।।इतिश्री प्रभु श्रीराम चालीसा समाप्त:।।

5. श्रीराम जी की कथा

यज्ञ और प्रसाद:

संतान प्राप्ति की कामना से महाराजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ और ऋंग ऋषि के मार्गदर्शन में विशाल पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर अग्निदेव ने प्रकट होकर दिव्य खीर (प्रसाद) प्रदान की। राजा ने इसे अपनी तीनों रानियों- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में वितरित कर दिया, जिसके फलस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।

प्रभु का प्राकट्य:

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, पुनर्वसु नक्षत्र और शुभ ग्रहों के विशेष संयोग में माता कौशल्या के गर्भ से नील वर्ण वाले तेजस्वी शिशु श्री राम का जन्म हुआ। इसके पश्चात रानी कैकेयी ने भरत को और रानी सुमित्रा ने लक्ष्मण व शत्रुघ्न को जन्म दिया।

उत्सव और नामकरण:

पूरे अयोध्या राज्य में आनंद छा गया, देवताओं ने पुष्प वर्षा की और गंधर्वों ने गान किया। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया। चारों भाई अपार प्रेम के साथ बड़े हुए और अल्पायु में ही समस्त विद्याओं व अस्त्र-शस्त्र संचालन में निपुण हो गए।

जन्म का उद्देश्य:

त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने राम रूप में अवतार अधर्म का विनाश करने, रावण के अत्याचारों को समाप्त करने और संसार में धर्म की स्थापना करने के लिए लिया था। इसीलिए हर वर्ष चैत्र नवमी को 'राम नवमी' के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

6. श्रीराम की पूजा का लाभ

1. मानसिक शांति और धैर्य

2. पारिवारिक सुख और सामंजस्य

3. नेतृत्व क्षमता और कर्तव्य बोध

4. आत्मविश्वास में वृद्धि: कठिन कार्यों को पूरा करने का साहस मिलता है।

5. चरित्र निर्माण: सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।

6. पापों का नाश: अनजाने में हुई गलतियों के पश्चाताप और शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

7. ग्रह दोष निवारण: विशेषकर शनि और राहु-केतु के दुष्प्रभावों में शांति मिलती है।

8. 'राम नाम' की शक्ति (आध्यात्मिक लाभ)

शास्त्रों में 'राम' नाम को महामंत्र माना गया है।

भय से मुक्ति: हनुमान चालीसा में भी कहा गया है कि राम नाम का जाप करने से भूत-पिशाच और नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं आतीं।

मोक्ष की प्राप्ति: मान्यता है कि अंत समय में राम नाम का स्मरण करने से जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।

9. राम रक्षा स्तोत्र और हनुमान जी की कृपा

राम रक्षा स्तोत्र: इसका नियमित पाठ शरीर और मन के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाता है, जिससे रोगों और दुर्घटनाओं से रक्षा होती है।

हनुमान जी की प्रसन्नता: हनुमान जी श्रीराम के परम भक्त हैं। जो व्यक्ति श्रीराम की शरण में जाता है, उसे हनुमान जी की कृपा स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, जिससे बल, बुद्धि और विद्या का विकास होता है।

"राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥"

(अर्थ: कलयुग में राम नाम मनचाहा फल देने वाला और इस लोक तथा परलोक में माता-पिता के समान रक्षा करने वाला है।)

7. श्रीराम जी के संबंध में पूछे जाने वाले प्रश्न-FAQs

1. भगवान श्रीराम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' क्यों कहा जाता है?

'मर्यादा पुरुषोत्तम' का अर्थ है- वह पुरुष जो मर्यादाओं में सबसे उत्तम हो। श्रीराम ने जीवन के हर चरण में (पुत्र, पति, भाई और राजा के रूप में) धर्म और मर्यादा का पालन किया। उन्होंने व्यक्तिगत सुख के बजाय हमेशा कर्तव्यों को प्राथमिकता दी, इसलिए उन्हें यह उपाधि दी गई।

2. श्रीराम के धनुष का नाम क्या था?

श्रीराम के दिव्य धनुष का नाम कोदंड था। यही कारण है कि उन्हें कई स्थानों पर 'कोदंड राम' भी कहा जाता है। (माता सीता के स्वयंवर में उन्होंने जिस धनुष को तोड़ा था, वह शिव जी का 'पिनाक' धनुष था)।

3. वनवास के दौरान श्रीराम कितने वर्षों तक बाहर रहे और कहाँ रहे?

श्रीराम 14 वर्ष के वनवास पर गए थे। इस दौरान उन्होंने अपना अधिकांश समय दंडकारण्य और पंचवटी (नासिक के पास) के जंगलों में बिताया। वनवास के अंतिम दिनों में वे माता सीता की खोज में दक्षिण की ओर गए और ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मिले।

4. श्रीराम के भाइयों की पत्नियों के नाम क्या थे?

भगवान राम के तीनों भाइयों का विवाह भी राजा जनक के परिवार की कन्याओं से हुआ था:

लक्ष्मण: उर्मिला (सीता जी की छोटी बहन)

भरत: मांडवी (कुशध्वज की पुत्री)

शत्रुघ्न: श्रुतकीर्ति (कुशध्वज की पुत्री)

5. भगवान राम के गुरु कौन थे?

श्रीराम के मुख्य रूप से दो गुरु थे:

महर्षि वशिष्ठ: जो रघुकुल के कुलगुरु थे और जिन्होंने चारों भाइयों को प्रारंभिक शिक्षा दी।

महर्षि विश्वामित्र: जो राम और लक्ष्मण को अपने साथ वन ले गए थे और उन्हें असुरों के संहार के लिए अस्त्र-शस्त्रों की विद्या दी।

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