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साहित्य
सत्यार्थी की संघर्ष गाथा, ऊंचा होता भारत का माथा

कैलाश सत्‍यार्थी को नोबेल शांति पुरस्‍कार घोषणा (10 अक्‍टूबर) की सातवीं वर्षगांठ पर विशेष

भारत के स्वर्णिम इतिहास के पन्नों में आज का दिन न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि हर देशवासी के लिए गर्वित करने वाला भी। आज ही के दिन सात साल पहले मध्य प्रदेश के विदिशा में जन्मे एक असाधारण व्यक्तित्व वाले साधारण खांटी भारतीय कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई थी।

बाल अधिकारों से जुड़े क्रांतिकारी कार्यों, अभियानों और गतिविधियों के लिए सत्यार्थी को इस पुरस्कार के लिए चुना गया था। सत्‍यार्थी एक ऐसे शख्‍स बने जिनकी वजह से भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के उन बच्चों के चेहरों पर मुस्कान संभव हो पाई, जो समाज के सबसे कमजोर और हाशिए के तबके से आते थे। सत्‍यार्थी ऐसे बेसहारा बच्‍चों के सहारा बने, जिन्हें बाल श्रम, बाल दुर्व्‍यापार (ट्रैफिकिंग), बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराइयों की गुलामी-रूपी बेड़ियों ने जकड़ा हुआ था।

गांधीजी विश्व के इस सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार के लिए कई बार नामांकित हुए, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें यह सम्मान नहीं मिल पाया। लेकिन, कैलाश सत्यार्थी ने शांति के लिए नोबेल पुरस्कार हासिल कर गांधीजी की ही सत्य और अंहिसा की परंपरा को आगे बढ़ाया है। वे बाल श्रम के खात्मे के लिए "करुणा के वैश्वीकरण" की वकालत कर रहे हैं। करुणा ही अंहिसा का

मूल है।

कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि गुलामी की बेड़ियां आजादी की चाहत से ज्यादा मजबूत होती हैं।" यह उद्धरण सत्यार्थी का बच्चों के प्रति उनके समर्पण को प्रतिबिम्बित करता है। सत्यार्थी की संघर्ष यात्रा की कहानी के नायक बच्चे ही हैं। वे बच्चे जिनके नायक उनके 'भाईसाहब' यानी सत्यार्थी हैं।

गौरतलब है कि बच्चों के बीच में सत्यार्थी भाईसाहब के रूप में जाने जाते हैं। सत्यार्थी के जीवन की संघर्ष-यात्रा की गाथा प्रेरणास्‍पद है जो हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ियों को बच्चों के प्रति संजीदा एवं संवेदनशील बनाएगी। सत्यार्थी को सन 2014 में जब नोबेल पुरस्कार मिला तो किसी ने उनसे पूछा कि नोबेल के बाद अब आगे क्या? उसके जवाब में सत्यार्थी ने कहा था कि यह मेरे जीवन का 'कॉमा' है 'फुल स्टॉप' नहीं। उनके कहने का मतलब था कि वे गुलाम बच्चों को आजाद कराने की लड़ाई जारी रखेंगे। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि नोबेल मिलने के बाद भी सत्यार्थी बाल अधिकारों की पैरवी करने वालों में सबसे आगे हैं।

सत्यार्थी को दुनियाभर के ऐसे बच्चों की आवाज कहना गलत नहीं होगा जिनके पास जुबान तो है पर वे बोल नहीं पाते। बच्चों को सामाजिक,मानसिक और आर्थिक रूप से आजादी दिलाने के लिए सत्यार्थी ने कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों और आंदोलनों की स्थापना की है।

सबसे पहले उन्‍होंने 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) की स्‍थापना की। बीबीए के बैनर तले उन्‍होंने एक लाख से ज्यादा बच्चों को बाल श्रम की गुलामी से मुक्त करवा कर उनका पुनर्वास कराया और समाज की मुख्यधारा से जोड़ा है।

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्‍कार मिलने के बाद उन्होंने कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फ़ाउंडेशन (केएससीएफ) की स्‍थापना की। यह संगठन दुनियाभर में बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनसे जुड़े बाल अधिकारों की वकालत करने में जुटा है। साथ ही यह सरकारों को बच्चों से जुड़ी नीतियों के निर्माण में भी मदद करता है।

सत्‍यार्थी ने वर्ष 2016 में लॉरियेट्स एंड लीडर्स फ़ॉर चिल्ड्रन समिट का शुभारंभ किया, जिसकी मेजबानी भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन में की। लॉरियेट्स एंड लीडर्स विविध क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर दूरदर्शी नेताओं, जिसमें नोबल पुरस्कार विजेताओं एवं वैश्विक नेताओं का एक ऐसा मंच है जो दुनिया के सबसे कमजोर बच्चों के लिए "करुणा का वैश्वीकरण" करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को प्रेरित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी मंच के तहत नोबेल पुरस्कार विजेताओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र के तत्‍कालीन महासचिव को वैश्विक शिक्षा के लिए धन की बढ़ोतरी के लिए एक लिखित हस्तक्षेप सौंपा था।

गौरतलब है कि उनके पत्र का 2015 के ओस्लो शिखर सम्मेलन के दौरान महासचिव द्वारा उल्‍लेख भी किया गया था। उसके बाद ही विश्‍व में शिक्षा के अवसरों को बढाने और उसमें खर्च होने वाले धन के लिए अंतरराष्‍ट्रीय आयोग की स्थापना हुई, जिसे अब शिक्षा आयोग के रूप में जाना जाता है।

सत्‍यार्थी ने वर्ष 2016 में '100 मिलियन फॉर 100 मिलियन' नामक अभियान की भी शुरुआत की। यह 100 मिलियन युवाओं द्वारा 100 मिलियन हाशिए के बच्चों के जीवन और भविष्‍य को बेहतर बनाने वाला एक वैश्विक आंदोलन है। इसका का उद्देश्य है युवाओं को प्रेरित कर ऐसे समाज का निर्माण करना जहां सभी बच्चे स्वतंत्र, सुरक्षित और शिक्षित हों। 2016 में इसकी शुरुआत के बाद से अब तक 36 से अधिक देशों के लाखों युवा, सिविल सोसायटी संगठन, ट्रेड यूनियन, स्कूल और विश्वविद्यालय इस अभियान में शामिल हुए हैं। ये सभी लोग कैलाश सत्यार्थी की प्रेरणा से अपने-अपने देशों के बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए मिलकर कार्य कर रहे हैं।

सत्यार्थी के ही प्रभावशाली नेतृत्व में कोरोनाकाल में 'फेयर शेयर फॉर चिल्ड्रेन' की भी नींव रखी गई। जिसका उद्देश्य दुनिया की सरकारों से बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए उनके द्वारा आवंटित बजट में बच्चों की भी हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना और इसके लिए विश्व सरकारों पर दबाव बनाना है। इसके साथ ही 'फेयर शेयर टू एंड चाइल्ड लेबर' की भी शुरुआत की गई जिसका उद्देश्य दुनियाभर में 2021 में बाल श्रम को जड़ से मिटाने का संकल्प लिया गया। सत्यार्थी द्वारा कोरोनाकाल में एक और अभियान की शुरुआत की गई जिसका नाम था'जस्टिस फॉर एवरी चाइल्ड'। अभियान का लक्ष्य देशभर के 100 जिलों के 100 फास्ट ट्रैक कोर्ट में 5,000 मामलों में बच्‍चों को तय समय-सीमा के भीतर न्‍याय दिलाना है। ताकि यह व्यवस्था पूरे देश में लागू हो सके।

सत्‍यार्थी ने बाल अधिकारों की प्राप्ति के लिए भारत और अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर इतने संगठनों और अभियानों का निर्माण किया है कि वे अब स्‍वयं संस्‍था हो गए हैं। उनका यह कहना कि वे अपने जीवनकाल में ही बाल श्रम को खत्‍म होते हुए देखना चाहते हैं, हमें एक विश्‍वास से भर देता है। साथ ही उम्मीद जगाता है कि आने वाला भविष्य नई पीढ़ी के बचपन को शिक्षित और सुरक्षित बनाएगा।


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