आरक्षण पर Supreme Court का बड़ा फैसला, जनरल कैटेगरी कोई कोटा नहीं, मेरिट सबके लिए समान
न्यायालय ने कहा कि जनरल कैटेगरी में सभी मेधावी छात्रों को जगह मिलनी चाहिए, फिर चाहे वो किसी भी जाति, धर्म, जनजाति, वर्ग या लिंग का हो। न्यायालय का कहना है कि फॉर्म में अपनी जाति लिख देना अपने आप में आरक्षित सीट पाने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सिर्फ यह बताता है कि उम्मीदवार आरक्षित सूची में भी दावेदार हो सकता है।
अदालत ने कहा कि इस तरह से आरक्षित श्रेणी के किसी अभ्यर्थी को ओपन कैटेगरी में चयनित होने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत दी गई समानता की गारंटी का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही देश में एक बार फिर आरक्षण पर बहस शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को आरक्षण की श्रेणी में आने वाले मेधावी उम्मीदवारों की बड़ी जीत माना जा रहा है। इस फैसले के साथ ही सरकारी नौकरियों में सामान्य श्रेणी की सीटों का मतलब भी नए सिरे से परिभाषित हो गया है।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 1992 के ऐतिहासिक इंद्रा साहनी केस से प्रेरित बताया गया, जिसमें सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% आरक्षण को सही ठहराया गया था।
राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को दी मंजूरी
पीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि आरक्षित वर्ग के वे अभ्यर्थी जिन्होंने सामान्य श्रेणी से अधिक अंक प्राप्त किए हों, उन्हें जनरल कैटेगरी की पोस्ट पर नियुक्ति दी जा सकती है।
हाईकोर्ट ने तर्क दिया था कि ऐसा करने से उन्हें 'दोहरा लाभ' मिलेगा, इसलिए उन्हें सामान्य श्रेणी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की आपत्ति को ठुकराते हुए कहा कि "ओपन का अर्थ सिर्फ 'ओपन' ही होता है। ऐसे पद किसी भी श्रेणी से संबंधित नहीं होते।"
क्या था पूरा मामला
मामला राजस्थान हाईकोर्ट में हुए भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था, जिसमें लिखित परीक्षा और इंटरव्यू शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि-
- यदि कोई आरक्षित वर्ग उम्मीदवार लिखित परीक्षा में सामान्य वर्ग के कटऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे सामान्य श्रेणी में माना जाएगा,
लेकिन यदि इंटरव्यू के बाद कुल अंक सामान्य श्रेणी कटऑफ से कम रह जाते हैं तो उसे उसके मूल आरक्षित वर्ग में गिना जाएगा।
- इस फैसले को आरक्षण और मेरिट आधारित चयन की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाला माना जा रहा है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
राजनीतिक दलों ने इस पर मिली जुली प्रतिक्रिया है। कुछ दल इसे मेरिट का सम्मान बता रहे हैं जबकि कुछ का कहना है कि इससे आरक्षण की भावना कमजोर हो सकती है। हालांकि सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार नियमों में आवश्यक बदलाव किए जाएंगे।
संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक यह फैसला आरक्षण को खत्म नहीं करता, बल्कि उसे अधिक तार्किक और प्रभावी बनाता है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'आरक्षण उपलब्ध होने के बावजूद यह किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को सामान्य श्रेणी की सीट पर मेरिट के आधार पर चयनित होने से नहीं रोकता।' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'आरक्षण उपलब्ध होने के बावजूद यह किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को सामान्य श्रेणी की सीट पर मेरिट के आधार पर चयनित होने से नहीं रोकता।' Edited by: Sudhir Sharma

