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वट सावित्री व्रत 2026: कब रखें व्रत? जानें 5 अनसुनी और रहस्यमयी बातें

वट सावित्री व्रत 2026: कब रखें व्रत? जानें 5 अनसुनी और रहस्यमयी बातें

Vat savitri vrat kab hai 2026: पूर्णिमान्त कैलेण्डर में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या पर मनाया जाता है, जिस दिन शनि जयन्ती भी होती है। अमान्त कैलेण्डर में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मनाया जाता है।
वट सावित्री व्रत को वट पूर्णिमा व्रत भी कहा जाता है। इस बार यह व्रत पहले 16 मई 2026 शनिवार को रखा जाएगा और दूसरा व्रत 29 जून सोमवार के दिन रखा जाएगा।

तिथि:

अमावस्या तिथि प्रारम्भ- 16 मई 2026 को प्रात: 05:11 बजे से।

अमावस्या तिथि समाप्त- 17 मई 2026 को देर रात 01:30 बजे तक।

शुभ मुहूर्त:

प्रात: 04:07 से 05:30 तक।

सुबह: 07:12 से 08:54 तक।

अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:50 से दोपहर 12:45 तक।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि.:

पूजा सामग्री:

बांस का पंखा (बीजना), कच्चा सूत (सफेद या लाल), धूप-दीप, घी।

फल: विशेषकर खरबूजा, आम और अन्य ऋतु फल।

नैवेद्य: भीगे हुए चने, पूड़ी और गुलगुले (बरगद के फल के समान बनाए गए पकवान)।

सुहाग का सामान (सिंदूर, चूड़ी, बिंदी आदि)।

पूजा विधि

स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए या साफ वस्त्र (संभव हो तो लाल या पीले) पहनकर व्रत का संकल्प लें।

वट वृक्ष के नीचे स्थान: बरगद के पेड़ के नीचे जाकर सफाई करें। यदि पेड़ न हो, तो घर में ही बरगद की टहनी को गमले में लगाकर पूजा करें।

स्थापना: वहां सावित्री-सत्यवान और यमराज की प्रतिमा (या मिट्टी की छोटी मूर्तियां) रखें। बरगद की जड़ में जल अर्पित करें।

अभिषेक और श्रृंगार: पेड़ को रोली, अक्षत और सिंदूर लगाएं। स्वयं भी सिंदूर लगाएं। इसके बाद फल, फूल और भीगे चने अर्पित करें।

सूत लपेटना (परिक्रमा): यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है। कच्चे सूत को हाथ में लेकर बरगद के पेड़ की 5, 11, 51 या 108 बार परिक्रमा करें और सूत को तने पर लपेटती जाएं।

पंखा झलना: बांस के पंखे से सावित्री-सत्यवान को हवा करें और फिर पेड़ को पंखा झलें। यह सेवा का प्रतीक माना जाता है।

कथा श्रवण: हाथ में भीगे चने लेकर वट सावित्री की कथा सुनें या पढ़ें। कथा के बाद वे चने प्रतिमा के पास छोड़ दें।

आरती और दान: पूजा संपन्न होने के बाद आरती करें। फिर सुहाग की सामग्री और फल किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद महिला को दान दें।

व्रत का पारण: पूजा खत्म होने के बाद बरगद की एक कोपल (नया पत्ता या कली) और भीगे हुए चने को जल के साथ निगलकर व्रत खोलें। इसके बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस दिन सुहागिन महिलाओं को अपने बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद जरूर लेना चाहिए, इसे पूजा का ही एक हिस्सा माना जाता है।

वट सावित्री व्रत से जुड़ी 5 अनसुनी और रोचक बातें

वट सावित्री की कथा (vat savitri vrat katha) तो लगभग सभी जानते हैं, लेकिन इस व्रत से जुड़ी कुछ ऐसी परंपराएं और तथ्य भी हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं:-

1. बरगद के पेड़ में 'त्रिमूर्ति' का वास

माना जाता है कि वट वृक्ष (बरगद) के मूल (जड़) में ब्रह्मा, छाल में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है। इसीलिए इस पेड़ की पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद एक साथ मिल जाता है।

2. कच्चा सूत और 108 परिक्रमा

पूजा के दौरान बरगद के पेड़ पर कच्चा सूत लपेटने की परंपरा है। कई महिलाएं 108 बार परिक्रमा करती हैं। यह सूत केवल धागा नहीं, बल्कि प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है जो पति-पत्नी के रिश्ते को अटूट बनाता है।

3. चने निगलने की अनोखी परंपरा

व्रत के पारण के समय कई क्षेत्रों में महिलाएं भीगे हुए चने बिना चबाए निगलती हैं। इसके पीछे मान्यता है कि यमराज ने जब सत्यवान के प्राण लौटाए थे, तब सावित्री को चने के रूप में ही "अंश" प्राप्त हुआ था। यह सावित्री के तप और धैर्य का प्रतीक है।

4. केवल सुहागिनें ही नहीं, कुंवारी कन्याएं भी

आमतौर पर यह सुहागिनों का व्रत है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं। हालांकि, उनके लिए नियम थोड़े अलग और सरल होते हैं।

5. सावित्री का 'अंग' मानी जाती है मिट्टी की प्रतिमा

पुरानी परंपराओं में केवल पेड़ की पूजा नहीं होती थी, बल्कि मिट्टी से सावित्री और सत्यवान की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा की जाती थी। आज भी कई घरों में मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर सावित्री-सत्यवान और यमराज की स्थापना की जाती है, ताकि घर में साक्षात देवी का आगमन हो सके।

सलाह: यदि आपके घर के पास बरगद का पेड़ न हो, तो आप इसकी एक टहनी लाकर गमले में स्थापित करके भी पूजा कर सकती हैं, या मानसिक रूप से ध्यान लगाकर पूजा संपन्न कर सकती हैं।

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