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लाखों की नौकरी छोड़कर यह शख्स ऐसे बन गया गरीबों का मसीहा !

गरीबों का मसीहा - आजकल लोग इतने स्वार्थी हो गए हैं कि अपने फायदे के लिए अगर किसी को नुकसान पहुंचाना पड़े तो वो इससे पीछे नहीं हटते हैं. शायद ही कोई ऐसा हो जो दूसरों को फायदा पहुंचाने के लिए खुद नुकसान झेले.

ऐसे में सवाल है कि क्या कोई किसी गरीब की मदद के लिए अपनी लाखों की नौकरी छोड़ सकता है. जाहिर सी बात है किसी के लिए कोई अपनी नौकरी क्यों छोड़ेगा.

लेकिन आज हम आपको एक ऐसे इंसान से रूबरू कराने जा रहे हैं जो लाखों रुपये की तनख्वाह वाली नौकरी को छोड़कर गरीबों का मसीहा बन गया.

शेफ ने छोड़ी लाखों की नौकरी

मदुरै के नारायण कृष्णन एक अवार्ड विनिंग शेफ हैं जो फाइव स्टार होटल में मोटी सैलरी पर काम किया करते थे. लेकिन एक दिन उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आया कि उन्होंने अपनी लाखों की नौकरी छोड़ दी और गरीबों की मदद करने में जुट गया.

नारायणन के मुताबिक वो साल 2002 में मदुरै शहर के एक मंदिर में गए थे, जहां उनकी नजर एक ऐसे बुजुर्ग शख्स पर पड़ी जो दयनीय हालत में पुल के नीचे बैठा था और कूड़े में खाना ढूंढ रहा था. इस नजारे को देखकर नारायणन को बड़ा झटका लगा और महज एक हफ्ते में नौकरी छोड़कर वो वापस घर लौट आए.

ऐसे बने गरीबों का मसीहा

अपनी लाखों की नौकरी छोड़कर नारायणन ने सबसे पहले उस बुजुर्ग के लिए खाने का इंतजाम किया और फिर वो हर उस इंसान को खाना खिलाने में जुट गए जो मानसिक रुप से कमजोर, गरीब और बेघर हैं. जो लोग खुद अपना ख्याल नहीं रख सकते नारायणन उनका पेट भरते हैं.

गरीब और बेघर लोगों को खाना खिलाने के इस मुहिम को शुरू करने के लिए शेफ नारायणन कृष्णन को सीएनएन ने हीरो ऑफ द ईयर चुना. आपको बता दें कि अमेरिकन टीवी चैनल ने यह अवॉर्ड उन लोगों को देता है जो रोजमर्रा के काम से गरीबों की दुनिया बदल रहे हैं.

रोज 400 लोगों को खिलाते हैं खाना

नारायणन को अपनी इस मुहिम के लिए एक वैन दान में मिली है जो हर रोज 125 मील का सफर तय करती है और करीब 400 लोगों को खाना खिलाया जाता है. नारायणन खुद अपने हाथों से इन लोगों के लिए खाना बनाते हैं. इतना ही नहीं अगर भूखा शख्स ज्यादा कमजोर हो तो उसे वो अपने हाथ से खाना भी खिलाते हैं.

इस काम के लिए नारायणन को हर रोज करीब 15 हजार रुपये की जरूरत होती है. जबकि उनके पास जो दान में रकम आती है उससे केवल 22 दिन का ही खर्च चल पाता है.

ये है गरीबों का मसीहा - इस मुहिम को चलाने के लिए नारायणन को पैसों की कमी का सामना करना पड़ता है लेकिन अपनी नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें गरीबों को हर रोज अपने हाथ से बना खाना खिलाने में बड़ा मज़ा आता है.

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