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अदालत ने कोविड-19 के कारण किरायेदारों के किराया रोकने से निपटने के लिये तय किया ये पैमाना

नयी दिल्ली, कोविड-19 जैसी “अप्रत्याशित घटनाओं” से उत्पन्न स्थिति का हवाला देकर किरायेदारों द्वारा किराये की अदायगी रोकने के मामले से निपटने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत व्यापक पैमाने तय किये हैं।


सांकेतिक चित्र (साभार: ShutterStock)


न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने खान मार्केट के कुछ किरायेदारों की याचिका को खारिज करते हुए ये पैमाने तय किये। इन याचिकाकर्ताओं ने किराये का भुगतान स्थगित किये जाने की मांग की थी क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण वे परिसर का इस्तेमाल नहीं कर पाए थे। न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि वे दुकान खाली करने के आदेश होने के बावजूद दुकान खाली करने को राजी नहीं हैं।

न्यायाधीश ने कहा,

“यह सवाल कि क्या बंद की वजह से किरायेदार माफी या किराये के भुगतान में छूट अथवा उसे निलंबित करने का दावा कर सकते हैं, देश में कई जगह किरायेदारों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाना तय है।”

उन्होंने कहा,

“इन सभी मामलों के निस्तारण के लिये कोई एक मानक नहीं हो सकता, लेकिन कुछ व्यापक मापदंडों को विचार में रखा जा सकता है, जिससे यह तय हो सके कि इस तरह के मामलों का समाधान कैसे हो।”

पैमाने तय करते हुए न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि जहां मकान मालिक और किरायेदार के बीच करार हुआ हो जिसमें “अप्रत्याशित घटना” का प्रावधान शामिल हो, जिसमें किसी तरह की छूट या किराये के भुगतान को स्थगित करने की बात हो तो सिर्फ उसी स्थिति में किरायेदार राहत का दावा कर सकता है।

उच्च न्यायालय ने कहा,

“करार में अप्रत्याशित घटना करार अधिनियम के तहत कोई आपदा भी हो सकती है जिसके आधार पर किरायेदार यह दावा कर सकता है कि यह करार अब शून्य हो गया है और परिसर को खाली कर सकता है। हालांकि, किरायेदार अगर परिसर को रखना चाहता है और ऐसा कोई उपबंध करार में नहीं है जिससे उसे राहत मिले तब किराया या मासिक शुल्क देय होगा।”

न्यायमूर्ति सिंह ने कहा कि ब्लैक के विधि शब्दकोश के मुताबिक ‘अप्रत्याशित घटना’ को “ऐसा वाकया या प्रभाव जिसका कोई अनुमान नहीं था न ही जिस पर कोई नियंत्रण हो” के तौर पर परिभाषित किया गया है और सामान्य शब्द कोश के मुताबिक “इसमें प्राकृतिक कृत्य (जैसे- बाढ़ और तूफान आदि) तथा लोगों के कृत्य (जैसे- दंगे, हड़ताल और युद्ध आदि) दोनों शामिल हैं।”


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(Edited by रविकांत पारीक)

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