Dailyhunt Logo
  • Light mode
    Follow system
    Dark mode
    • Play Story
    • App Story
'डोमिनो इफेक्ट': तेल की कीमत बढ़ने से कमर्शियल गैस समेत सबकुछ महंगा! $126 पहुंचा क्रूड और सिलेंडर के दाम ₹1000 बढ़े

'डोमिनो इफेक्ट': तेल की कीमत बढ़ने से कमर्शियल गैस समेत सबकुछ महंगा! $126 पहुंचा क्रूड और सिलेंडर के दाम ₹1000 बढ़े

Zee Business Hindi 1 month ago

भारतीय अर्थव्यवस्था इस वक्त एक ऐसे दोहेरी चुनौती के मुहाने पर खड़ी है, जिसे आप 'परफेक्ट स्टॉर्म' यानी खतरों का एक साथ मिल जाना कह सकते हैं. एक तरफ ईरान के साथ जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों को चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है.

वहीं दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में करीब एक हजार रुपये की भारी बढ़ोतरी ने हड़कंप मचा दिया है. चलिए समझते हैं कि कैसे तेल की बढ़ती कीमतें ना सिर्फ LPG संकट को बढ़ा रही हैं, बल्कि 'श्रिंकफ्लेशन' (Shrinkinflation) के जरिए आपकी पूरी रसोई का बजट चुपचाप बिगाड़ रही हैं.

$126 के पार कच्चा तेल

वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय युद्ध की आग में झुलस रहा है. कच्चे तेल की कीमतों ने $126 प्रति बैरल के स्तर को छू लिया, जो कि युद्ध शुरू होने से पहले के $73 के स्तर से कहीं ज्यादा है. इसका मुख्य कारण ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ता तनाव है.

तेहरान ने 'स्ट्रेस ऑफ होर्मुज' को ब्लॉक कर रखा है. यह दुनिया का वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का 20% कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) गुजरती है.

ये भी पढ़ें: आपके किचन में Shrinkinflation का खेल! MRP वही, सामान आधा, युद्ध के बाद 30 दिन का राशन 20 दिन में खत्म

मार्च के महीने में ही ब्रेंट क्रूड में 50% की तेजी देखी गई. हालांकि बीच में कीमतें गिरकर $114 तक आई थीं, लेकिन शांति वार्ता में आए गतिरोध ने फिर से बाजार में आग लगा दी है. अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों और होर्मुज की बंदी ने दुनिया को एक बड़े ऊर्जा संकट में धकेल दिया है.

कमर्शियल LPG का झटका

आम जनता भले ही अभी पेट्रोल-डीजल की पुरानी कीमतों पर राहत महसूस कर रही हो, लेकिन कमर्शियल सेक्टर के लिए आज का दिन किसी बुरे सपने जैसा है. 19 किलो वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में ₹993 से लेकर ₹994 तक का इजाफा किया गया है.

प्रमुख शहरों में नई कीमतें-

शहरवृद्धि (₹)नई कीमत (₹)पुरानी कीमत (₹)
दिल्ली9933071.52078.5
कोलकाता99432022208
मुंबई99330242031
चेन्नई990.532372246.5

यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर रेस्तरां, होटलों और छोटे ढाबों की लागत बढ़ाएगी, जिसका अंतिम बोझ बाहर खाना खाने वाले आम आदमी की जेब पर ही आएगा.

'श्रिंकफ्लेशन' का मायाजाल

तेल में लगी आग की चपेट में सिर्फ गैस सिलेंडर ही नहीं है, बल्कि वह अब आपकी रसोई में ग्रोसरी के डिब्बों तक पहुंच गई है. अगर आपको लग रहा है कि आपकी रसोई का सामान पहले की तुलना में जल्दी खत्म हो रहा है, तो आप सही हैं.

कंपनियां महंगाई से बचने के लिए 'श्रिंकफ्लेशन' का सहारा ले रही हैं. यानी पैकेट की कीमत नहीं बढ़ाई जा रही, बल्कि उसके अंदर का वजन कम किया जा रहा है.

ये भी पढ़ें: West Asia Crisis! फ्यूल को लेकर भारत का मास्टर प्लान, सरकार का दावा- LPG से लेकर पेट्रोल तक सप्लाई फुल कंट्रोल में

कंपनियों ने दो चरणों में यह खेल खेला है-

मार्च का महीना: पहले सीधे तौर पर प्रति किलो ₹20 से ₹30 की बढ़ोतरी की गई.

अप्रैल-मई का महीना: जब ग्राहकों ने विरोध शुरू किया, तो कंपनियों ने कीमतें स्थिर कर दीं लेकिन पैकेट का साइज छोटा कर दिया. उदाहरण के लिए, 1 किलो वाला तेल का पैक अब घटकर 840ml से 910ml के बीच रह गया है. यह एक 'छिपी हुई महंगाई' है जिसे आम उपभोक्ता समझ नहीं पाता.

किचन से बाथरूम तक हर तरफ वजन की कटौती

एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर की हर बड़ी कंपनी अब वजन घटाने के ट्रेंड पर चल रही है. सरसों तेल, रिफाइंड, घी से लेकर साबुन और बिस्किट तक, सब कुछ 'सिकुड़' गया है.

वजन में बदलाव का हिसाब-किताब-

उत्पादपहले का वजनअब का वजनअसर
खाद्य तेल 1 लीटर840 - 910 ml₹20-30 का नुकसान
घी / मसाले500 ग्राम400 ग्रामसीधा 20% कम सामान
नहाने का साबुन125 ग्राम100 ग्रामजल्दी खत्म होना
डिटर्जेंट 1 किलोग्राम850 ग्राममहीने के अंत में खाली डिब्बा
बिस्किट/चिप्स 100 ग्राम80-90 ग्राम सीधा 10% से 20% कम

ट्रांसपोर्टेशन की मार से सब कुछ महंगा

जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. हवाई यात्रा से लेकर ट्रक के किराए तक, सब कुछ इसकी जद में आता है.

हवाई ईंधन (ATF): सरकार ने एटीएफ पर ₹33 प्रति लीटर का निर्यात शुल्क लगाया है. एयरलाइंस के लिए ईंधन सबसे बड़ा खर्च है, इसलिए आने वाले दिनों में टिकट के दाम बढ़ना तय है.

शिपिंग और ट्रक: ट्रकों और जहाजों का ईंधन महंगा होने से फैक्ट्रियों से सामान दुकानों तक पहुंचना महंगा हो गया है. यह लॉजिस्टिक कॉस्ट ही अंत में खुदरा कीमतों को ऊपर ले जाती है.

राइड शेयरिंग: उबर और ओला जैसी कंपनियां भी फ्यूल सरचार्ज लगा सकती हैं, जिससे आपकी रोज की यात्रा महंगी हो जाएगी.

खेती और थाली पर असर

भोजन की बढ़ती कीमतों के पीछे सिर्फ डीजल की महंगाई नहीं है. कृषि क्षेत्र में तेल और गैस का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में होता है.

खाद और कीटनाशक: उर्वरक (Fertilizers) बनाने में प्राकृतिक गैस और तेल का अहम रोल होता है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, खेती की कुल लागत का 50% हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा लागत से जुड़ा होता है.

खेती के उपकरण: ट्रैक्टर और हार्वेस्टर डीजल पर चलते हैं. जब इनकी परिचालन लागत बढ़ती है, तो किसान की फसल की लागत भी बढ़ जाती है.

पैकेजिंग: आप जो प्लास्टिक पैकेट में सामान खरीदते हैं, वह पेट्रोलियम उत्पादों से बनता है. तेल महंगा होने से पैकेजिंग कॉस्ट भी बढ़ गई है.

कपड़े से लेकर प्लास्टिक तक सब महंगा

तेल का असर आपकी अलमारी और घर की सजावट पर भी पड़ता है.

कपड़े: पॉलीस्टर और स्पैन्डेक्स जैसे सिंथेटिक कपड़े पेट्रोलियम आधारित होते हैं. कच्चे तेल में तेजी का मतलब है कि आपके कपड़े भी आने वाले समय में महंगे हो सकते हैं.

प्लास्टिक उत्पाद: बच्चों के खिलौने, किचन के डिब्बे, बाल्टियां और घर की सजावट का सामान प्लास्टिक से बनता है. यह सब कच्चा तेल महंगा होने की वजह से महंगा हो जाता है.

आम आदमी क्या करे?

यह स्थिति अभी कुछ समय तक बनी रह सकती है. ऐसे में उपभोक्ताओं को अपनी रणनीति बदलनी होगी.

फिजूलखर्ची पर लगाम: गैर-जरूरी ड्राइविंग से बचें. कारपूलिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट या साइकिल का इस्तेमाल करके ईंधन का खर्च कम किया जा सकता है.

थोक खरीदारी: जो सामान खराब नहीं होते (Essential Goods), उन्हें कीमतों में और बढ़ोतरी होने से पहले बल्क में खरीदकर रखा जा सकता है.

बजट का पुनर्मूल्यांकन: अपने मासिक खर्चों की समीक्षा करें और आपातकालीन स्थिति के लिए कुछ अतिरिक्त पैसे बचाकर रखें, क्योंकि 'श्रिंकफ्लेशन' की वजह से आपको सामान बार-बार खरीदना पड़ेगा.

डोमिनो इफेक्ट का मतलब क्या है?

'डोमिनो इफेक्ट' (Domino Effect) का मतलब बहुत आसान है. आपने बचपन में ताश के पत्तों या लकड़ी के गुटकों को एक लाइन में खड़ा करके खेल जरूर खेला होगा, जिसमें एक को गिराने पर पूरी लाइन अपने आप गिरती चली जाती है. बस, अर्थशास्त्र (Economy) में भी यही होता है.

जब तेल जैसी किसी बुनियादी चीज की कीमत बढ़ती है, तो उसका असर केवल पेट्रोल पंप तक नहीं रहता, बल्कि वह एक के बाद एक कई सेक्टरों को गिराता (प्रभावित करता) चला जाता है.

इसे 4 स्टेप्स में समझिए-

पहला पत्थर (कच्चा तेल): युद्ध या तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमत $126 पहुंच गई. यह पहला डोमिनो गिरा.

दूसरा पत्थर (ट्रांसपोर्ट): तेल महंगा होते ही ट्रकों का भाड़ा, जहाजों का ईंधन और विमानों का टिकट महंगा हो गया.

तीसरा पत्थर (उत्पादन लागत): अब जो कंपनियां साबुन, बिस्किट या कपड़े बनाती हैं, उनके लिए कच्चा माल फैक्ट्री तक लाना और तैयार माल बाजार भेजना महंगा हो गया. साथ ही प्लास्टिक और खाद जैसी चीजें (जो तेल से बनती हैं) उनकी लागत भी बढ़ गई.

चौथा पत्थर (उपभोक्ता की जेब): अंत में कंपनियां अपना घाटा पूरा करने के लिए या तो दाम बढ़ाती हैं या पैकेट छोटा कर देती हैं (श्रिंकफ्लेशन).

Dailyhunt
Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Zee Business Hindi