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महंगाई का नया मीटर! क्या RBI बढ़ाएगा आपकी EMI? जानिए यस बैंक की रिपोर्ट का पूरा सच

महंगाई का नया मीटर! क्या RBI बढ़ाएगा आपकी EMI? जानिए यस बैंक की रिपोर्ट का पूरा सच

देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त एक बड़े दोराहे पर खड़ी है. एक तरफ घरेलू मांग और सरकारी खर्च के दम पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ दुनिया के दूसरे हिस्से में चल रहे युद्ध ने तनाव बढ़ा दिया है.

यस बैंक की लेटेस्ट रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई अपनी अगली यानी अप्रैल की पॉलिसी में शायद ही कोई बड़ा बदलाव करे. राहत की बात यह है कि आपकी ईएमआई अभी बढ़ने वाली नहीं है, लेकिन महंगाई का ग्राफ थोड़ा ऊपर जा सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हेडलाइन सीपीआई यानी खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के बेस केस से बढ़कर 4.5 से 4.8 प्रतिशत तक जा सकती है. इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में खाने-पीने की चीजों और रोजमर्रा के सामान की कीमतों में हल्की तेजी देखने को मिल सकती है.

जीडीपी ग्रोथ और युद्ध का साया

भारत की रफ्तार अभी तो अच्छी दिख रही है, लेकिन यस बैंक ने एक चेतावनी भी दी है. अगर अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा युद्ध लंबा खिंचता है, तो हमारी जीडीपी ग्रोथ पर इसका सीधा असर पड़ेगा. अभी तक भारत की ग्रोथ काफी मजबूत रही है, जिसे घरेलू खपत और सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर किए जा रहे खर्च से सहारा मिला है.

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महंगाई बढ़ने के 3 बड़े विलेन

यस बैंक की रिपोर्ट में उन कारणों का जिक्र किया गया है जो आपकी जेब ढीली कर सकते हैं. सिर्फ युद्ध ही इकलौता कारण नहीं है, बल्कि कुदरत और ग्लोबल मार्केट भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

महंगाई बढ़ने के मुख्य कारण-

इनपुट कॉस्ट: मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए कच्चा माल महंगा हो रहा है, जिसका बोझ अंत में ग्राहक पर ही पड़ता है.

अल नीनो का खतरा: अगर अल नीनो का असर होता है, तो खेती पर बुरा असर पड़ेगा और खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाएंगी.

फर्टिलाइजर की कीमत: खाद की बढ़ती लागत अगर किसानों तक पहुंचाई गई, तो खेती की लागत बढ़ेगी.

इन सबके अलावा, अगर संकट और गहराया तो सरकार को मजबूरन पेट्रोल और डीजल के रिटेल रेट बढ़ाने पड़ सकते हैं. फिलहाल सरकार इसका बोझ खुद झेल रही है ताकि आम जनता पर सीधा असर न पड़े.

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RBI का स्टैंड

यस बैंक का मानना है कि आरबीआई अभी 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में रहेगा. आरबीआई को ब्याज दरें बढ़ाने की कोई जल्दी नहीं है. इसके पीछे कुछ ठोस वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह यह है कि महंगाई भले ही बढ़ रही हो, लेकिन यह 6 प्रतिशत की खतरनाक सीमा को पार नहीं करेगी.

सप्लाई साइड का मुद्दा: फिलहाल महंगाई सप्लाई की कमी की वजह से है, न कि डिमांड बहुत ज्यादा होने से. ऐसे में रेट बढ़ाकर इसे कंट्रोल करना मुश्किल होता है.

ग्रोथ को सपोर्ट: आरबीआई का फोकस अभी आर्थिक विकास की रफ्तार को बनाए रखने पर है.

रुपये की मजबूती: डॉलर के मुकाबले रुपया अभी एक दायरे में स्थिर बना हुआ है, जिससे आरबीआई को राहत मिली है.

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क्या रेट कट का दौर खत्म हो गया?

रिपोर्ट में एक कड़वा सच यह भी है कि अब ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए. दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अभी महंगाई को लेकर काफी सतर्क हैं. रुपये की वैल्यू गिरने का दबाव और महंगाई का बढ़ता ट्रेंड इशारा कर रहा है कि ब्याज दरें कम होने का समय निकल चुका है.

हालांकि, अच्छी बात यह है कि भारत इस संकट के दौर में एक मजबूत स्थिति में दाखिल हुआ है. हमारे पास कम महंगाई और हाई ग्रोथ का एक बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड रहा है, जो हमें बाहरी झटकों से निपटने की ताकत देता है. सरकार ने भी राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) के जरिए तेल की कीमतों का झटका सहने की कोशिश की है.

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