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मिलिए रौनक से, कभी अश्नीर ग्रोवर ने कहा था 'तू बैठ जा यार', बस 0.6% उम्मीद पर लगाया दांव, बना दी Success Story!

मिलिए रौनक से, कभी अश्नीर ग्रोवर ने कहा था 'तू बैठ जा यार', बस 0.6% उम्मीद पर लगाया दांव, बना दी Success Story!

इंटरनेट पर वायरल होने वाली ज्यादातर कहानियां कुछ ही दिनों में दम तोड़ देती हैं, लेकिन इस कहानी को मुकाम तक पहुंचने में पूरे 4 साल लग गए. बात साल 2022 की है, जब एक युवा आंत्रप्रेन्योर (उद्यमी) रौनक अधिकारी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपने स्टार्टअप का आइडिया अश्नीर ग्रोवर के सामने रखना चाहते थे.

हालांकि, वह एक बड़ा कार्यक्रम था, जिसमें अश्नीर स्टेज पर थे और रौनक दर्शकों के बीच. वहां अश्नीर ने रौनक को बीच में ही रोक दिया था.

अश्नीर ने बेहद रूखे अंदाज में कहा, "तू बैठ जा यार." अश्नीर का यह बोलना था कि वहां मौजूद पूरी ऑडियंस जोर से हंस पड़ी. किसी भी आम इंसान के लिए इस तरह का सार्वजनिक अपमान बरसों का दर्द बन सकता था, जो उसे दोबारा कोशिश करने से रोक देता. लेकिन रौनक के लिए यह अपमान उनके सपनों का ईंधन बन गया. बता दें कि रौनक ने 17,000 कंपनियों को पीछे छोड़कर प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के 'टाइगर लॉन्च' में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

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बचपन की चुनौतियों ने बनाया मजबूत

जब रौनक से पूछा गया कि इस सार्वजनिक अपमान के बाद उन्होंने खुद को कैसे संभाला, तो उन्होंने एक बेहद दिलचस्प बात कही. रौनक ने बताया, "जब वह वाकया हुआ, तब तक जिंदगी मुझे ऐसे झटकों के लिए पहले ही तैयार कर चुकी थी."

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव मदनपुर में जन्मे रौनक को बचपन में हकलाने (Stuttering) की समस्या थी. इस वजह से स्कूल में 16 साल की उम्र तक बच्चों ने उन्हें काफी बुली (परेशान) किया. रौनक ने बहुत छोटी उम्र में तय कर लिया था कि उन्हें अपने लिए खुद ही लड़ना होगा. उन्होंने खुद को अकेला पाकर किताबों की दुनिया में झोंक दिया. वे विज्ञान और बिजनेस की किताबें पढ़ने लगे. इसके अलावा उन्होंने स्टेट लेवल पर क्रिकेट भी खेला, लेकिन पीठ की चोट के कारण उनका खेल का सफर थम गया.

धीमे कंप्यूटर ने बदली सोच

मदनपुर गांव में रौनक शायद इकलौते ऐसे बच्चे थे जिनके घर में कंप्यूटर था. लेकिन वह कंप्यूटर बेहद धीमा और पुराना था. तब रौनक ने 9 साल की उम्र से ही उस धीमे कंप्यूटर को तेज चलाने के लिए खुद ही इंजीनियरिंग और जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया. यही कंप्यूटर उनके लिए बाहरी दुनिया की खिड़की बन गया.

बचपन की यही उलझन आगे चलकर एक बड़े बिजनेस आइडिया में बदल गई. रौनक ने 'ProjectX' और 'Infinity' नाम का एक क्लाउड-बेस्ड ऑपरेटिंग सिस्टम तैयार किया. इसका मकसद यह है कि महंगे हार्डवेयर के बिना भी लोग इंटरनेट के जरिए दुनिया का सबसे ताकतवर कंप्यूटर अपने साधारण सिस्टम पर चला सकें. उनकी इसी काबिलियत के कारण महज 19 साल की उम्र में वे आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में एक रिसर्चर और कोर्स इंस्ट्रक्टर बन गए थे.

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200 से ज्यादा रिजेक्शन और कंगाली का दौर

सफलता की कहानियां अक्सर सोशल मीडिया पर बहुत सुंदर दिखती हैं, लेकिन हकीकत बेहद कड़वी होती है. अश्नीर ग्रोवर के उस रिजेक्शन के बाद रौनक का सफर बेहद कांटों भरा रहा. उन्हें एक या दो नहीं, बल्कि 200 से ज्यादा इन्वेस्टर्स (निवेशकों) ने रिजेक्ट किया. कई बड़े वेंचर कैपिटलिस्ट्स ने तो उनसे इस आइडिया को पूरी तरह बंद करने तक को कह दिया था.

इस मुश्किल दौर में उनके को-फाउंडर्स (साथी) उनका साथ छोड़ गए, कंपनी का पूरा फंड खत्म हो गया और वे एक से ज्यादा बार कंगाल हुए और वे भारी कर्ज में डूब गए थे. वाई कॉम्बिनेटर (Y Combinator) में सिलेक्शन से ठीक पहले उनके बैंक खाते में 1 लाख रुपये से भी कम बचे थे.

लेकिन रौनक को खुद पर भरोसा था. धीरे-धीरे उन्हें आईआईटी बॉम्बे से ग्रांट मिली, फिर 'स्टार्टअप इंडिया' और 'पॉन्टेक वेंचर्स' का साथ मिला. इसके बाद उन्होंने 17,000 कंपनियों को पीछे छोड़कर प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के 'टाइगर लॉन्च' में भारत का प्रतिनिधित्व किया. उन्हें स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और ड्रेपर डीपटेक जैसी जगहों से फेलोशिप और आमंत्रण मिलने लगे.

केवल 0.6% उम्मीद पर लगाया दांव

रौनक की जिद का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वाई कॉम्बिनेटर के नतीजे आने से ठीक पहले, उन्हें और उनके साथियों को भारत वापस लौटना था. लेकिन उन्होंने अपनी भारत वापसी की फ्लाइट छोड़ दी. उन्हें पूरा भरोसा था कि उनका अमेरिकी लॉन्च वायरल होगा और उन्हें वाई कॉम्बिनेटर में एंट्री मिल जाएगी.

जबकि वाई कॉम्बिनेटर में सिलेक्शन होने की संभावना महज 0.6% होती है. जहां लोग इतने कम चांस पर हाथ खड़े कर देते हैं, वहां रौनक ने अपनी जिद के दम पर वो मुकाम हासिल कर लिया. आज उनका स्टार्टअप दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप एक्सीलेटर 'Y Combinator' का हिस्सा बन चुका है, जिसने कभी ड्रॉपबॉक्स, एयरबीएनबी और स्ट्राइप जैसे ग्लोबल ब्रांड्स को जन्म दिया था.

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"दूसरों की तारीफ और बुराई सिर्फ एक शोर है"

जब रौनक से पूछा गया कि वे आज अश्नीर ग्रोवर वाले वाकये को कैसे देखते हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि उस दिन उनके बगल में उनका दोस्त मोक्ष बैठा था. अश्नीर के डांटने के बाद जब वे अपनी सीट पर वापस आए, तो उन्होंने अपने दोस्त से कहा था, "देखना, कुछ सालों बाद जब प्रोजेक्ट एक्स एक हकीकत बन जाएगा, तब मैं इस घटना पर एक रील बनाऊंगा." आज उनकी वह बात सच साबित हो चुकी है.

रौनक कहते हैं, "दूसरों से मिलने वाली तारीफ या बुराई सिर्फ एक शोर (नॉइज) है. आपका अपने आइडिया और समस्या पर भरोसा होना ही असली सिग्नल है." वे आज भी अपने उस 9 साल के बच्चे के लिए काम करते हैं जिसके पास अच्छा कंप्यूटर नहीं था, उस 13 साल के बच्चे के लिए जिसे बुली किया गया और उस 19 साल के युवा के लिए जिसे सरेआम बैठने को कह दिया गया था.

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Conclusion

रौनक अधिकारी की यह कहानी देश के करोड़ों उन युवाओं के लिए एक मिसाल है जो छोटे शहरों या गांवों से आते हैं और जिनके पास कोई बड़ा गॉडफादर या बैंक बैलेंस नहीं होता. यह कहानी साबित करती है कि अगर आपके भीतर अपने आइडिया को लेकर अटूट विश्वास है, तो दुनिया का बड़े से बड़ा रिजेक्शन भी आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता. किसी ने सच ही कहा है कि उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है.

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