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Reservation In India: आजादी से पहले भारत में 'Reservation Policy' हो गई थी लागू

केंद्र की पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को नौकरी और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है (Reservation For General Category)। इसके बाद राजनीतिक गलियारे में भूकंप आ गया है। आरक्षण (Reservation) को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। कई लोग इसे आरक्षण के नाम पर वोट की राजनीति कह रहे हैं। सामान्य वर्ग में इस घोषणा को लेकर मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। एक वर्ग है जो इस तरह के आरक्षण का पूरी तरह विरोध कर रहा है। तो वहीं एक वर्ग इस घोषणा से खुश है। ट्विटर पर कई लोगों ने कहा है कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है। आइए जानते हैं कि भारत में आरक्षण (Reservation In India) क्या है?


देश में कुल आरक्षण

मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के लोगों को दस प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। इससे देश में 60 प्रतिशत आरक्षण लागू हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने केवल 50 प्रतिशत आरक्षण देने का ही आदेश दिया है। सामान्य वर्ग को आरक्षण देने के लिए सरकार को अनुच्छेद 15 और 16 में बदलाव करना पड़ेगा।

अभी अनुसूचित जाति को 15 प्रतिशत आरक्षण, अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है। राजस्थान में अगड़ी जातियों को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। वहां 68 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू है।

आजादी के पहले आरक्षण

  • 1882 में महात्मा ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व की मांग की। जिसके बाद 1882 में प्राथमिक शिक्षा के लिए हंटर कमीशन का गठन किया गया।
  • 1891 में त्रावणकोर रियासत में सिविल नौकरियों में देसी लोगों की बजाय बाहरी लोगों को तरजीह देने के खिलाफ सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग उठी।
  • 1901 में कोल्हापुर रियासत के छत्रपति शाहूजी महाराज ने वंचित तबके के लिए आरक्षण की व्यवस्था की। उन्होंने वंचितों के लिए मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल की व्यवस्था की। ताकि सभी लोगों को समान अधिकार मिल सके। देश में वर्ग विहीन समाज की वकालत की।
  • 1908 में अंग्रेजों मे भी प्रशासन में कम हिस्सेदारी वाली जातियों की भागीदारी बढ़ाने का प्रावधान किया।

आजादी के बाद आरक्षण

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जनजातियों को शुरुआत में 10 सालों के लिए आरक्षण देने की बात संविधान में कही। उसके बाद लगातार समय सीमा को बढ़ाया जाता रहा। आजादी के बाद आरक्षण वोट लेने का एक मुद्दा बन गया।

मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की पहचान करने के लिए मंडल आयोग का गठन किया। मंडल आयोग के अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल थे। मंडल आयोग के पास अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में शामिल उप जातियों का ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं था।

आयोग ने 1930 की जनसंख्या के आधार पर 1,257 समुदायों को पिछड़ी जाति में शामिल किया और उनकी आबादी 52 प्रतिशत निर्धारित की। 1980 में कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। जिसमें आयोग ने कहा था कि मौजूदा 22 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण जोड़ा जाए।

मंडल आयोग की इस रिपोर्ट को 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की शिफारिश को लागू कर दिया। ओबीसी आरक्षण के लागू होते ही इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई। जिसमें कोर्ट ने आरक्षण की व्यवस्था को वैधानिक ठहराया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता।

संविधान क्या कहता है

  • संविधान के भाग तीन में समानता के अधिकार की भावना निहित है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, प्रजाति, लिंग, धर्म या जन्म के स्थान के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। 15 (4) के अनुसार राज्य को यह अधिकार है कि अगर वह चाहे तो अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।
  • अनुच्छेद 16 (4) में कहा गया है कि यदि राज्य चाहे तो सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण ला सकता है।
  • अनुच्छेद 330 के तहत संसद और 332 में राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं।

Dailyhunt
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