Monday, 20 Jan, 5.01 am हिन्दुस्थान समाचार

पोर्टल प्रादेशिक
बॉलीवुड फिल्मों से भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहा हॉलीवुड : धामा

संदीप माथुर

जयपुर, 20 जनवरी (हि.स.)। फिल्में केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं हैं, ये समाज और इतिहास का दर्पण होने के साथ ये अनसुलझी समस्याओं का समाधान भी हैं। यह उद्गार प्रसिद्ध लेखक तेजपाल सिंह धामा ने 12वें जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (जिफ) में विशिष्ट वक्ता के रूप में व्यक्त किए। तेजपाल सिंह धामा के उपन्यास 'अग्नि की लपटें' पर संजय लीला भंसाली ने फिल्म 'पद्मावत' का निर्माण किया था।

धामा ने कहा कि कड़वी सच्चाई यह है कि सिनेमा का जन्म मनोरंजन परोस सिर्फ पैसे कमाने के लिए नहीं हुआ। बावजूद इसके अगर फिल्म देखने के बाद क्या सही और क्या गलत को लेकर लोग सोचने लगते हैं, जो दर्शाता है कि फिल्म ने उनका मनोरंजन नहीं किया। हमें सोशल मीडिया के माध्यम से मनोरंजन उद्योग की सोच और संवदेना पर पड़ रहे असर को कम करके नहीं आंकना चाहिए।

लेखक तेजपाल ने कहा कि बदलती सामाजिक व्यवस्था के साथ-साथ फिल्में भी बदलती गई। निर्माता-निर्देशक अधिक दर्शकों तक पहुंचना चाहते हैं ताकि जितना हो सके अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सकें और कमाना भी चाहिए। कई अभिनेत्रियों ने अभिनय कला के कुछ ज्यादा ही नए प्रयोग किए हैं। इसी कारण कुछ हॉलीवुड फिल्मों में नग्नता और हिंसा अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है लेकिन इससे विदेशी दर्शक अब उबने लगे हैं। यही कारण है कि भारतीय हिन्दी फिल्में आज विदेशों में लोगों को भारतीय पारिवारिक मूल्यों के प्रति आकर्षित कर रहीं हैं। भारत में कुछ फिल्में ऐसी बनी हैं कि उनके संवाद दिल को इस तरह छू जाते हैं कि उन्हें बार-बार देखने का मन करता है। वे मिसाल बन गई हैं।

धामा ने कहा कि इस समय बॉलीवुड टर्निंग प्वाइंट पर खड़ा है। युवा मनोरंजन ही नहीं अलग हटकर सीखने और कुछ नया कर गुजरने की प्रेरणा के लिए फिल्मे देख रहे हैं। आज का युवा अपने इतिहास और अतीत को भी जानना चाहता है। वह जानता है कि जिसने अपना इतिहास भुला दिया उसे नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता। दर्शकों की पसंद को समझते हुए ही इतिहास पर फिल्म बनाने का नया दौर शुरू हुआ है।

धामा के अलावा जिफ में गैंग्स ऑफ वासेपुर और पान सिंह तोमर के डायरेक्टर और राइटर तिग्मांशु धूलिया ने अशोका, मैं हूं ना के संवाद तथा वॉर और रोबोट 2.0 के गीत लेखक अब्बास टायरवाला, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स, तुम्बाड, वीरे दी वेडिंग, हिचकी और उरी जैसी फिल्मों में लिरिक्स राइटर रहे राज शेखर, वज़ीर फिल्म के डायलॉग राइटर अभिजीत देशपाण्डे, बाला के लेखक निरेन भट्ट, अभिनेत्री दीया डे, जेएफएम डायरेक्टर प्रज्ञा राठौड़, बॉलीवुड के मशहूर खलनायक प्रेम चोपड़ा, ऑस्ट्रेलिया के फिल्ममेकर मयूर कटारिया और लाल कप्तान के लेखक दीपक वेंकटेशन, इंद्रनील घोष ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए। उल्लेखनीय है कि जिफ में 69 देशों की 229 फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई। वहीं डेस्कटॉप श्रेणी में 186 फिल्में प्रदर्शित की गई।

हिन्दुस्थान समाचार

Dailyhunt
Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Dailyhunt. Publisher: Hindusthan Samachar
Top