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रासबिहारी बोस जयंती विशेष: वायसराय पर बम से लेकर आजाद हिंद फौज की बुनियाद तक, कूटनीति के उस महानायक की गाथा

रासबिहारी बोस जयंती विशेष: वायसराय पर बम से लेकर आजाद हिंद फौज की बुनियाद तक, कूटनीति के उस महानायक की गाथा

Rash Behari Bose Birth Anniversary: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे जांबाज क्रांतिकारी हुए हैं, जिन्होंने अपनी सूझबूझ, अदम्य साहस और अप्रतिम त्याग से इतिहास की धारा बदल दी।

देश के इन्हीं महान सपूतों में 'रासबिहारी बोस' का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

आज 25 मई को उनकी जन्म जयंती के अवसर पर शिव सत्संग मंडल के राष्ट्रीय समन्वयक अम्बरीष कुमार सक्सेना ने उन्हें नमन करते हुए कहा कि राष्ट्र की आजादी के आंदोलन में रासबिहारी बोस का ऐतिहासिक योगदान हमेशा अमर रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में हुआ था। वे बचपन से ही बेहद साहसी, प्रखर राष्ट्रभक्त और विद्रोही स्वभाव के थे। ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी और क्रूर नीतियों ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही सशस्त्र क्रांति की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर दिया था।

लॉर्ड हार्डिंग पर हमला: साल 1912 में ब्रिटिश भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर दिल्ली के चांदनी चौक में बम फेंकने की ऐतिहासिक और दुस्साहसिक योजना के पीछे मुख्य दिमाग रासबिहारी बोस का ही था। इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। इस हमले के बाद अंग्रेजी खुफिया एजेंसियां और पुलिस उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गईं, लेकिन वे अपनी चतुराई और वेश बदलने की कला से अंग्रेजों को चकमा देकर बच निकलने में सफल रहे।

ब्रिटिश सरकार की सख्त और चौतरफा घेरेबंदी से बचते हुए रासबिहारी बोस कूटनीतिक तरीके से जापान पहुंच गए। उन्होंने यह साबित किया कि क्रांति केवल देश की सीमाओं के भीतर रहकर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच से भी लड़ी जा सकती है।

जापान की धरती पर कदम रखने के बाद भी उनके भीतर की देशभक्ति की अग्नि मंद नहीं हुई। उन्होंने वहां सुदूर पूर्व एशिया में रह रहे भारतीयों और युद्धबंदियों को एकजुट करने का भगीरथ प्रयास किया:

इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना: उन्होंने विदेशों में रह रहे भारतीयों को एक राजनीतिक मंच पर लाने के लिए 'इंडियन इंडिपेंडेंस लीग' का गठन किया।

आजाद हिंद फौज का गठन: उन्होंने देश की आजादी के लिए सैन्य संघर्ष को अनिवार्य मानते हुए 'आजाद हिंद फौज' (आईएनए) की मजबूत नींव रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।

नेताजी को सौंपी कमान: एक दूरदर्शी और नि:स्वार्थ नेता की मिसाल पेश करते हुए रासबिहारी बोस ने इस विशाल सैन्य संगठन का नेतृत्व और कमान युवा व ओजस्वी नेता सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंप दी, जिसके बाद इस आंदोलन को एक नई और आक्रामक दिशा मिली।

शिव सत्संग मंडल के राष्ट्रीय समन्वयक अम्बरीष कुमार सक्सेना ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रासबिहारी बोस केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक अद्वितीय संगठनकर्ता और दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ थे। उनका संपूर्ण जीवन हमें सिखाता है कि मातृभूमि की रक्षा और सेवा से बढ़कर संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं है।

आज के युवाओं को उनके जीवन से विपरीत परिस्थितियों में भी अटूट साहस बनाए रखने, नि:स्वार्थ भाव से राष्ट्र सेवा करने और समर्पण की सीख लेनी चाहिए। भारत माता का यह महान सपूत कूटनीति और क्रांति के साझा इतिहास में हमेशा अमर रहेगा।

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