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बडी  बहन-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी

बडी बहन-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी

Short Motivational Story: आज सबसे छोटी बहन सीमा की हल्दी थी। दो साल पहले मंझली की शादी के बाद पापा को उसकी ''शादी की फिक्र लग गयी। संयोग से रिश्ते में ही एक लडका मिल गया तो शादी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर बाकी जिदंगी चैन से काटना चाहते थे।

सबसे छोटा भाई एम. कॉम कर रहा था। उसके तरफ से वे निशिचिंत थे। जब नौकरी लगेगी तब शादी की सोची जाएगी। वैसे भी लड़के केा लेकर मां-बाप को उतनी चिंता नहीं होती जितनी बेटी को लेकर।
ऐसे समय में मैं अपने कमरे में मायूस लेटी हुयी थी। तभी मां ने आवाज दी। न चाहते हुए भी मैं उठी। आंगन में आयी। मामी की नजर पडी तो उलाहना देने से बाज नहीं आयी। ''कहां हो पूनम। तुम्हारी बहन की हल्दी है और तुम्हीं गायब हो?'' मेरे चेहरे पर फीकी मुस्कान तिर गयी। मैने कटोरे में रखी हल्दी को उठाकर सीमा के हाथों और पैरों में लगाया। यह सिर्फ औपचारिकता थी। एक बेमन से निभाया गया रस्म। जैसे ही काम खत्म हुआ अपने कमरे में आकर फिर से उन्हीं यादों में खो गयी जो सिवाय पीड़ा देने के और कुछ नहीं दिया।

पापा का खुद का व्यापार था। व्यापार में घाटा हुआ तो घर का हर कीमती सामान बिक गया। हालत यह हो गयी कि खाने तक के पैसे नहीं थे। तब मेरे मामा और मौसी जी ने मदद के लिए हाथ बढाया। किसी तरह मैंने ग्रेजुएशय किया। इस दौरान ट्यूशन करके घर के लिए रूपये कमाती रही। इससे पापा जी को काफी राहत मिली। बाद में मेरी सरकारी नौकरी लग गयी तो सब कुछ अच्छा हो गया।
मैंने अपनी मंझली और छोटी बहन को पढाया लिखाया। छोटे भाई रजनीश को एम.कॉम कराया। घर का बोझ उठाते उठाते मैं 36 की हो गयी। एक तरह से मैंने अपने शादी की आस छोड दी। फिर भी इस बात की कसक हमेशा रहती कि अगर पापा का व्यापार ठीक ठाक होता तो निश्चय ही पहले घर बसता। सोचते-सोचते मेरी आंखे भर आयी। तभी पापा आये। कमरे में छाये अंधेरे को देखकर स्विच आन किया।
''तुम यहां?'' तत्काल उठकर मैं अपने कपड़े ठीक करने लगी। वे आगे बोले,''बाहर जाओ सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हेै।''
''चली जाउंगी।''मेरा स्वर बुझा हुआ था। वे मेरे करीब आये। भरे मन से बोले,''पूनम, मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल पर क्या गुजर रही है। पर मजबूर हूं। जब तुम्हारे "शादी की उम्र थी तब तुमने अपना सारा वक्त इस घर को संवारने में लगा दिये। अगर नहीं लगाती तो यह घर बिखर जाता।''
''पापा, मैंने आपकी जिम्मेदारी निभायी है।''
''इससे मैं कब इनकार कर रहा हूं। अगर बेटा बड़ा होता तो शायद यह जिम्मेदारी उसके नाम होती। पर क्या करूं। तीन बेटियों केा बाद रजनीश का जन्म हुआ।''
''पापा मेरा कुसूर क्या है?'' मै फफक पड़ी। ''जब हंसने खेलने की उम्र तब मैंने अपना समय संघर्ष करते गुजारा। इसके बावजूद मेरा अपना कहने के लिए कुछ नहीं रहा। मैं सिर्फ कमाने वाली मशीन बनकर रह गयी हूं।''
''ऐसा मत कहो। बिना तुम्हारे हाथ पीले किये मैं इस दुनिया से रूखसत नहीं करूंगा।''कहते कहते पापा का स्वर बिंध गया। मेरे आंखों से झर झर आंसू बह निकले।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi