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मेरा अस्तित्व तुमसे-गृहलक्ष्मी की कविता

मेरा अस्तित्व तुमसे-गृहलक्ष्मी की कविता

Hindi Poem: नारीत्व को कितनी संज्ञाएं और उपमाएं मिली,

धरा, जननी सी विशालता मिली,

गंगा सी आब बनी,

प्रकृति की अनुपम कृति,

देवी तुल्य दुर्गा, चंडी का रुप,

मर्यादा का अनुष्ठान,

दिव्य कर्तव्य, दायित्व का आधार,

संस्कार की जड़े,

विचारों में सम्मान मिला,

अंनता,अपरिमित का ताज,

मेरा अस्तित्व उन पुरुषों को समर्पित,

जिन्होंने पुरुष प्रधान समाज होते हुए भी,

मतभेदों को मिटाकर,

निर्भरता के आवरण को हटाकर,

स्वावलंबी का वाहन अर्पित किया,

निर्माण किया मेरी आत्मीय इंसानियत सूरत का,

हवा में नारीत्व का अमृत घोलकर

आभामंडल को विस्तृत किया,

सांसो को जीवन मंत्र देकर,

मेरी ईकाई को पहचान दी।

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Disclaimer: This content has not been generated, created or edited by Dailyhunt. Publisher: Grehlakshmi