संस्कार की जड़े,
विचारों में सम्मान मिला,
अंनता,अपरिमित का ताज,
मेरा अस्तित्व उन पुरुषों को समर्पित,
जिन्होंने पुरुष प्रधान समाज होते हुए भी,
मतभेदों को मिटाकर,
निर्भरता के आवरण को हटाकर,
स्वावलंबी का वाहन अर्पित किया,
निर्माण किया मेरी आत्मीय इंसानियत सूरत का,
हवा में नारीत्व का अमृत घोलकर
आभामंडल को विस्तृत किया,
सांसो को जीवन मंत्र देकर,
मेरी ईकाई को पहचान दी।
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