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गर्मी की छुट्टियाँ: चारपाइयों, आम और बेफिक्र बचपन के दिन

गर्मी की छुट्टियाँ: चारपाइयों, आम और बेफिक्र बचपन के दिन

Hindi Short Story: कुछ शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे अपने भीतर पूरा बचपन समेटे होते हैं। मेरे लिए ऐसा ही एक शब्द है—'गर्मी की छुट्टियाँ।' यह शब्द सुनते ही आंखों के सामने नानी का घर, आंगन में बिछी चारपाइयाँ, आम के पेड़, मिट्टी की सोंधी खुशबू और भाई-बहनों के साथ बिताए वे बेफिक्र दिन घूमने लगते हैं।

ऐसा लगता है जैसे समय कुछ पल के लिए पीछे लौट आया हो और मैं फिर वही छोटी-सी बच्ची बन गई हूं, जिसके लिए दुनिया का सबसे बड़ा सुख छुट्टियों का इंतजार था।

स्कूल की आखिरी घंटी बजते ही मन में एक अलग ही खुशी भर जाती थी। किताबें बंद होते ही लगता था कि अब पढ़ाई से छुट्टी और मस्ती की शुरुआत। घर लौटकर सबसे पहले सामान बांधने की तैयारी होती और नानी के घर जाने की उत्सुकता बढ़ती जाती। ट्रेन या बस का सफर भी किसी रोमांच से कम नहीं लगता था। खिड़की से बाहर भागते पेड़ देखते हुए बस एक ही ख्याल रहता—कब नानी का घर आएगा? नानी के घर पहुंचते ही जैसे मेरा पूरा संसार बदल जाता था। नानी दरवाजे पर खड़ी मुस्कुराती हुई मिलतीं और उनके चेहरे की खुशी देखकर सफर की सारी थकान गायब हो जाती। उनके हाथ का खाना तो आज भी याद आते ही मुंह में स्वाद भर देता है। दोपहर में आम के पेड़ की छांव में बैठकर आम खाना, फिर कजिन्स के साथ छत पर खेलना और शाम होते ही गली में दोस्तों के साथ दौड़ना—इन छोटी-छोटी चीजों में ही हमारी सारी खुशियां छिपी थीं।

गर्मी की दोपहर में जब बाहर निकलने की मनाही होती, तब हम घर के अंदर लुका-छिपी, कैरम और अंताक्षरी खेलते। कभी-कभी नानी अपनी पुरानी यादें और बचपन की कहानियां सुनातीं। हम सब उनके आसपास बैठकर बड़े ध्यान से सुनते। रात को छत पर चारपाइयां बिछतीं। ठंडी हवा चलती, आसमान में अनगिनत तारे दिखाई देते और हम अपनी कल्पनाओं की दुनिया में खो जाते। बिजली चली जाती तो वही अंधेरा भी हमें डराता नहीं था, क्योंकि पूरा परिवार साथ होता था।

सबसे मजेदार समय तब होता, जब सुबह-सुबह हम बिना किसी अलार्म के सिर्फ इसलिए उठ जाते कि आज दिनभर खेलने का मौका मिलेगा। न कोई जल्दी, न कोई समय की पाबंदी और न ही मोबाइल की जरूरत। मिट्टी से सने कपड़े, पसीने से भीगे चेहरे और खिलखिलाती हंसी—यही हमारी असली दौलत थी। आज जिंदगी बहुत बदल गई है। जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं और वे लंबी छुट्टियां भी शायद कहीं पीछे छूट गई हैं। लेकिन “गर्मी की छुट्टियाँ” शब्द आज भी मेरे भीतर एक मीठी घंटी बजा देता है। यह मुझे याद दिलाता है कि खुशियां बड़ी चीजों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों में छिपी होती हैं जिन्हें हम अपनों के साथ जीते हैं।

मेरे बचपन की सबसे प्यारी यादों में नानी का घर और गर्मी की छुट्टियां हमेशा सबसे ऊपर रहेंगी। शायद यही वजह है कि आज भी यह शब्द सुनते ही मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और मन कह उठता है—काश, बचपन की वे छुट्टियां एक बार फिर लौट आएं!

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