गन्ना शब्द सुनते ही मैं अपने बचपन में बिताए नानीघर की गलियों और उन मीठी यादों में पहुँच जाती हूँ। शायद इसका एक कारण यह भी है कि मुझे गन्ना बहुत पसंद है। यूँ तो मेरी स्मृति-कोष में नानीघर की अनेक यादें संचित हैं, पर इन यादों में गन्ने और उसके रस का एक अलग ही महत्व है। शहर में पली-बढ़ी मैं गाँव की दुनिया से कहाँ परिचित थी। गाँव के जीवन से बिल्कुल अनजान थी। नानीघर गाँव में होने के कारण हर साल हम सभी भाई-बहनों को गर्मियों और जाड़े की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार रहता था। गाँव में होने वाली गतिविधियों को हम बहुत कौतूहल से देखते थे। हमारे लिए वहाँ की हर चीज नई और आकर्षक होती थी। नानीघर में खेतों से ताजे-ताजे गन्ने आया करते थे। गन्ने का रस निकालने के लिए आज की तरह बिजली से चलने वाली मशीनें नहीं होती थीं।
एक बड़ी-सी मशीन होती थी, जिसे दो बैल चलाते थे। बैल गोल-गोल घूमते जाते और मशीन में गन्ने डाले जाते। गन्ने से रस निकलने की वह पूरी प्रक्रिया हमारे लिए बहुत आकर्षण का केंद्र होती थी। हम बड़े कौतूहल से उसे देखते रहते थे। उन ताजे निकले हुए गन्ने के रस को देखकर ही मन खुश हो जाता था। उसमें स्वाद बढ़ाने के लिए किसी भी प्रकार की कृत्रिम चीज नहीं मिलाई जाती थी। गन्ने का अपना प्राकृतिक स्वाद और उसकी मिठास ही उसकी पहचान थी। हम उस ताजे रस का भरपूर आनंद उठाते थे। गन्ने से केवल रस ही नहीं मिलता था, बल्कि उसके रस से चावल की खीर भी बनाई जाती थी। ओह! उस खीर का स्वाद आज भी मेरे मन के किसी कोने में बसा हुआ है। उस समय शायद हमें यह एहसास नहीं था कि ये छोटी-छोटी खुशियाँ आगे चलकर हमारे जीवन की इतनी प्यारी यादें बन जाएँगी।
आज भी कहीं गन्ने का रस पीने का मौका मिलता है, तो मैं अनायास ही उन्हीं ख्यालों में खो जाती हूँ। आँखों के सामने वही दृश्य उभर आता है, "खेत से आए ताजे गन्ने, उन्हें चलाने वाले दो बैल, मशीन से निकलता हुआ मीठा रस और उसी रस से बनी स्वादिष्ट खीर।" आज भी मैं गन्ने का रस पीने का कोई अवसर नहीं छोड़ती, लेकिन अब उस रस में वह स्वाद, वह मिठास और वह अपनापन कहाँ, जो उन दिनों हुआ करता था। शायद मिठास केवल गन्ने में नहीं थी, मिठास तो उस समय में थी, उन बेफिक्र दिनों में थी। आज गन्ने की मिठास से कहीं ज्यादा मीठी उसकी वह याद है, जो मुझे हर बार मेरे नानीघर, मेरी गर्मियों की छुट्टियों और मेरे उस मासूम बचपन तक ले जाती है, जो समय की राह में कहीं बहुत पीछे छूट गया है।
काश! समय की उस राह पर कभी लौटना संभव होता और एक बार फिर वही ताजा गन्ने का रस पीते हुए अपने उस खूबसूरत बचपन को जी पाती। धन्यवाद प्रतिभा गुप्ता

