Nani Ka Ghar: आज भी उन दिनों को याद करके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है जब नानी के जाते थे तो कितना उत्साह रहता था मन मैं, हो भी क्यूँ ना तब का समय ही कितना अलग था नानी के साथ आसपास के घर के लोगों मैं भी घर जैसा ही प्रेम होता था हम जब भी नानी के घर जाते तो वहां जाने कितनी नानी मिल जाती थी जिनका अपनापन देख कर लगता ही नहीं था कि ये पराये है उन्हें मम्मी की पसंद भी याद थी और बड़े प्यार से कहती थी कि घर आना तेरी पसंद के दही बड़े बना दूंगी तुझे मेरे हाथ के पसंद थे और तेरे बच्चों को क्या पसंद है, दूसरी नानी कुछ बनाती कोई और कुछ, उनका इतना स्नेह देख मुझे लगता बस यहीं रह जाए पर...
हम साल मैं एक बार ही नानी के जा पाते थे क्यूंकि नानी का घर दूसरे शहर मैं था तो गर्मी की छुट्टियों मैं ही जाते थे नानी के घर पहुंचने से पहले ही कितने चेहरे ऐसे दिख जाते जैसे उन्हें भी हमारा ही इंतजार हो ।नानी के घर पहुचते तो आसपास के लोग भी आ जाते मिलने और खूब प्यार से मिलते।
हमारी मौज रहती क्यूंकि नानी के यहां तो फरमाइश पूरी होती थी फिर रोज शाम को एक नई नानी से मिलने जाते मम्मी कहती ये भी तुम्हारी नानी ही है, मम्मी को बिल्कुल बेटी की तरह अपनापन मिलता और हमें नानी वाला प्यार मिलता दिन भर धमा चौकड़ी चलती क्यूंकि तब सब घर एक ही मानते थे किसी के घर जाने से पहले सोचना नहीं पड़ता था सब बच्चे मिलकर खेलते कभी पिकनिक मनाते कभी गुड़िया की शादी करते तो सब मिलकर अपने अपने घर से खाने का सामान लाते, बड़ा मज़ा आता रात मैं सब लोग बाहर आ जाते सब अपने किस्से कहानी सुनाते समय पता नहीं कहाँ निकल जाता वापसी मैं नानी बहुत सारा सामान रखती और साथ मैं बाकी नानी भी कुछ ना कुछ देती बोलती बेटी को खाली हाथ नहीं भेजते।
हम भाई बहन बहुत खुश होते क्यूंकि नानी का घर, घर नहीं प्रेम का भंडार लगता था जितना भी करती कभी कम नहीं होता हर साल उतना ही प्रेम मिलता था नानी के जाने का बहुत दुख हुआ क्यूंकि घर तो बही था लेकिन नानी वाला प्रेम नहीं था। समय के साथ कितना कुछ बदल गया अब तो आपस मैं इतना प्रेम देखने को ही नहीं मिलता,बस नहीं बदला तो नानी वाला प्यार जो मेरे बच्चों को मिला और अब उनके बच्चों को मिल रहा है जिसे देख कर लगता है कि हम कितने खुशनसीब थे जो इतना प्यार मिला ये सोचकर आज भी चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। ।
अंजना ठाकुर

