Nani Ka Ghar: नानी से जुड़ी कोई भी बात या नानी घर की किसी घटना का जिक्र आता है तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं। मैंने अपनी नानी को कभी देखा ही नहीं। मेरी माँ के बचपन में ही मेरी नानी का देहांत हो गया था।
मेरी माँ को उनकी अजिया(दादी) ने पाला था। इस तरह नानी के रूप में उन्हीं अजिया नानी की कुछ धुँधली यादें हैं।
बिन माँ की बच्ची होने के कारण मेरी माँ को ही अपने पीहर जाने की इजाजत नहीं थी तो हम बच्चों की बिसात ही क्या! मेरी दादी का कहना था कि चचेरी नानी या मामा-मामी मेरे पोते-पोतियों की देखभाल ठीक से नहीं कर पाएँगे इसलिए उन्हें नानीघर जाने की कोई जरूरत नहीं। दरअसल हम बच्चों के बहाने हमारी दादी हमारी माँ को उनके मायके नहीं भेजना चाहती थीं। माँ के बिना दादी की गृहस्थी कौन सँभालता?
खैर हमें भी नानी के नहीं रहने से नानीघर जाने का कोई उत्साह नहीं रहता था, पर एक बार मामा के बेटे की शादी में जाने का बुलावा आया तो दादी मना नहीं कर सकीं। मैं करीब दस-बारह वर्ष की रही हूँगी। मामा की एक ही बेटी थी जो मेरी उम्र की ही थी सो मैं बहुत उत्साहित थी। मेरे छोटे मामा तब नेपाल में रहते थे। वे उस शादी में वहीं से आए थे और सभी के लिए कुछ-न-कुछ विदेशी सामान उपहार के रूप में ले आए थे। मेरी माँ और दीदी के लिए इंपोर्टेड असली जाॅर्जेट की बहुत खूबसूरत साड़ी और मेरे तथा मामा की बेटी के लिए पारदर्शी दुपट्टे लेकर आए थे। वैसे दुपट्टे हमने पहले कभी नहीं देखे थे। मुझे तो बहुत अच्छा लगा कि बेकार में दादी नानीघर की बुराई करती थीं। कितना अच्छा तो है नानी का घर जहाँ हमें इतने सुन्दर-सुन्दर उपहार मिलते हैं।
मैं जब वापस आयी तो दादी से दो टुक शब्दों में बोल दिया, “आप तो इतनी बुराई करती थीं, पर देखिए! मेरी नानी का घर इतना अच्छा है। कितना सुन्दर उपहार मिला है। आपने तो मुझे कभी कुछ नहीं दिया।”
इस पर मेरी दादी ने तपाक से कहा, “हुँह! दस वर्ष में एक बार एक ओढ़नी क्या मिल गया, यूँ बखान कर रही है जैसे कारूँ का खजाना मिल गया हो!”
मैं भी जैसे अड़ गयी थी। मैंने कहा, “कारूँ का खजाना क्या होता है, मुझे नहीं पता। मुझे तो मेरी यह ओढ़नी इतनी भा गयी और ऐसा लग रहा जैसे आसमान के सितारे मेरे आँचल में उतर आए हों! अब मेरे सामने मेरे नानीघर की कभी बुराई मत करना! मैं नहीं सह पाऊँगी।”
सच! वह नीले रंग का दुपट्टा मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है। मैंने उसे की सालों तक सँजोकर रखा था। वैसा दुपट्टा मैं आजतक भी नहीं ले पायी कभी। शायद बचपन कुछ-कुछ स्वार्थी भी होता है…!
गीता चौबे गूँज
hindi short story: यादों में नानी का घर-गृहलक्ष्मी लघु कहानी

