Nani Ka Ghar: बहुत ही सुनहरे दिन थे जब सभी गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाते थे एक साथ खाते पीते, सोते, खेलते। उसमें भी कुछ वाक्या तो आज भी भुलाये नहीं भूलते हैं।
हमारे चार मामा, तीन मौसी यानी मेरी मां आठ भाई बहन रहे।
फिर भी नानी का घर हमारी मम्मियों मौसियों के नाम से भी जाना जाता था यह सबसे बड़ी बात थी। इतने सारे बच्चे एक साथ होते तो हुड़दंग तो होना ही था, मस्ती भी बेशुमार हुआ करती थी। जून के महीने में नानाजी ढेर सारे फल, लीची, लौकाट, ना जाने क्या-क्या पूरी की पूरी पेटी भर कर लाया करते ,पूरा आंगन भर जाता और सब पानी में डाल डाल कर आम ठंडा कर करके खाते ।
कभी-कभी आइसक्रीम वाले को नानी के घर की चौक में ही बुला लिया जाता और वो मटकी वाली जिसे आज मटका कुल्फी कहते हैं वह आइसक्रीम काट काट कर हमें खिलाता जाता और हम बच्चे पेट भर के खाते जाते ।
ऐसे ही ना जाने कितने किस्से हैं जिन्हें हम आज भी याद कर खुश होते हैं। ज्यादा सुविधाएं बेशक नहीं थी पर नानी के घर की वह यादें आज भी अनमोल धरोहर है।
जून के महीने में नानी के घर ही हम सभी के घर के लिए अचार डाला जाता ,नानाजी ढेर सारी आमियां भेज देते। पूरा आंगन भरकर कच्ची आमियां आती, मामियां जहां रसोई संभालती वही मम्मी मौसी और हम सभी बच्चे आमी काटते।
लेकिन मुझे जरा कच्ची आमी खाने की मनाही थी क्योंकि मुझे गले में टॉन्सिल्स जल्दी हो जाया करते थे। लेकिन इसके उल्टे मुझे अचार बेहद पसंद था कच्ची आमी तो जैसे मेरी जान थी,उस समय तो जितना चाहे खिला लो, ऐसी वाली हालत थी।
ऐसे ही एक दिन की बात है सभी आमी काट रहे थे और मैं भी उसमें शामिल थी पर मेरी नजर सबसे नजर बचाकर कुछ आमी छुपाने की थी पर मां की आंख बराबर मुझ पर लगी हुई थी... क्या करूं सोच रही थी ।
मैंने लंबा सा फ्रॉक पहना था कुछ आमी काटती कुछ फ्रॉक में गिरा लेती धीरे-धीरे मेरी फ्रॉक में आधा किलो के करीब ढेर सारी कच्ची आमी इकट्ठी हो गई फिर मैं सब की नजर बचाकर उन आमियों पर नमक लगाकर रात को खाया करती जब लाइट चली जाती। चांद छत पर खिला होता, जमीन में बिस्तर लगे होते और मैं तकिए के नीचे से धीरे-धीरे से आमी निकलती और खाती।
उस दिन भी सभी लगातार आमियां काट रहे थे , मैं तो बस आमियां किसी तरह से छुपाना चाहती थी अचानक मम्मी की कोई बचपन की सहेली उनसे मिलने आ गई तो मेरी तो जैसे लॉटरी लग गई मैं सारी आमी उठाकर संदूक वाले कमरे में जिसे आजकल स्टोर रूम कहते हैं उसमें ले जाकर एक छोटी सी थैली में भरकर रख दी और रात होने का इंतजार करने लगी।
रात को जब सबके बिस्तर लग गए, पानी के गिलास जग सब वहां तैयार हो गए तो मैं स्टोर रूम से अपनी थैली ले जाकर छत पर धीरे से उसे खोलकर देखने लगी।
देखा तो उसमें आमी नहीं थी,कुछ बिस्कुट थे, मेरी सारी आमियां गायब थी मुझे तो जैसे रोना आ गया मैं सुबह से ही थैली में से आमी निकाल कर खाने का इंत
जार कर रही थी, मैं धीरे-धीरे सुबकने लगी की और सोचने लगी कि नानी के घर के चूहे तो मेरी आमी नहीं खा गए...पर एक बड़ा सवाल मासूम के मन में यह भी था कि आमी के बदले बिस्कुट चूहे तो नहीं रख सकते?
तभी मेरी नानी मेरे पास आती है और धीरे से मेरा हाथ पकड़ कर कहती है क्यों गुड़िया रानी क्यों रो रही है ?आमी ढूंढ रही है ना ...पर बेटा देख इतनी सारी आमियां एक साथ खाने से तेरी तबीयत खराब हो जाती है ना... इससे तो तू थोड़ा-थोड़ा रोज खा ले ,इतनी सारी एक साथ खायेगी तो तेरे टॉन्सिल हो जाएंगे और तेरी मां तेरे आमी खाने पर बिल्कुल पाबंदी लगा देगी।
तब नानी ने मुझे थोड़ी सी आमी अपने हाथ से दी, मैं नानी से लिपट गई और कहने लगी ओह नानी आप कितनी अच्छी हो। बस आज भी वो अनमोल किस्से नानी के घर के मेरे दिल की गुल्लक में बंद हैं जो आज इस कहानी को लिखते समय आंखों के आगे आ गये। इस तरीके की नानी के घर की अनगिनत यादें मेरे ज़हन में आज भी समाई है।
ऋतु गुप्ता

