हर वर्ष रक्षाबंधन से तीन दिन पहले से ही रक्षाबंधन की तैयारी शुरू हो जाती थी। हम लोग राजस्थानी मारवाड़ी हैं।हमारे परिवार में पारंपरिक रूप से रक्षाबंधन मनाया जाता था। जिसमें नायेंन ब्रह्माणियां खड़िया(चोक) का लेप करके छोड़ दिया जाता था।
रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व उस पर सुंदर-सुंदर कलाकृतियां बनाई जाती थी जैसे राम-राम लिखना, श्री, सीताराम ,लिखना स्वास्तिक बनाना या भिन्न-भिन्न प्रकार की फूल पत्तियां बनाना आदि यह दरवाजे के दोनों और बहुत ही सुंदर लगता था।
रक्षाबंधन के दिन प्रात: काल हम लोग स्नान आदि से निवृत होकर गेट के दोनों और बने हुए इन सून की पूजा किया करते थे।
हमारे यहां लड्डू के साथ कलवा (मोली) से सून जिमाये जाते थे। इसके बाद रोली और जल से चिरच दिया जाता था। यह प्रतिष्ठानों के दरवाजे पर बनाए जाते थे। हमारे यहां प्रसाद जी की राखी बांधने का कार्यक्रम भोजन करने के उपरांत किया जाता है राखी के त्यौहार को हमारे यहां “सलूने” भी कहा जाता है दोपहर में भोजन के उपरांत लगभग 3:00 बजे हमारे यहां राखी बांधने का कार्यक्रम होता था।जिसमें बहन एवं बुआ अपने भाई भतीजो के राखिया बांधती थी व टीका करती थी और मिठाइयां खिलाती थी। इसके बाद भाई बहन की रक्षा का वचन देता था एवं कुछ उपहार स्वरूप भेट भी बहन को देता था। कार्यक्रम में पूरा दिन कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था।
गूगा जी को घी,आटा,शक्कर भोग लगाया जाता था। सभी लोग अपनी-अपनी राखियां खोलकर गूगा जी की प्रतिमा के सामने समर्पित कर देते थे
हम लोग आज भी इस परंपरागत त्यौहार को उसी भांति बड़े धूमधाम से सारे परिवार के साथ मानते हैं यह परंपरा हमें हमारे बुजुर्गों से विरासत में मिली है।

