व्यक्ति यदि अज्ञानी है, परन्तु ईश्वर और जगत के प्रति उसकी भावनात्मक निष्ठा है तो वह धार्मिक है, ईश्वर को प्रिय है। भारतीय दर्शन में धर्म शब्द अत्यन्त व्यापक भी है और सारगर्भित भी।
धर्म की परिभाषा को सम्प्रदाय से जोड़ दिया गया है, जबकि धर्म हमारे सदाचरण और पवित्र विचार है। जीवन मूल्य सदा सनातन और शाश्वत रहते हैं। वे कालातीत नहीं होते।
उन्हें क्षेत्रकाल अथवा सम्प्रदाय के आधार पर विभक्त भी नहीं किया जा सकता। धर्म जीवन मूल्यों का प्रतीक है। वह सबके लिए समान है। गुड़ यूरोप, अमेरिका अफ्रीका तथा एशियावासियों सभी को मीठा लगेगा। गुड़ कोई भी खाये सभी को वही स्वाद देगा। यही स्थिति धर्म की है। वह सबके लिए समान है। पंथ सम्प्रदाय विभिन्न हो सकते हैं, परन्तु धर्म सबका एक ही है। ईश्वर सबका एक है, भले ही क्षेत्र और भाषा अलग-अलग होने से उनके नाम भी अलग-अलग हो सकते हैं।
धर्म सात्विक आदर्श है, पवित्र आचार विचार हैं, जिससे अपना तथा साथ में दूसरों का कल्याण सम्भव हो। सत्य, दया, करूणा, त्याग, अहिंसा, क्ष्ज्ञमा, विद्या, विनम्रता, सहनशीलता आदि धर्म के गुण हैं। इन गुणों को हम वर्ग विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष से नहीं जोड़ सकते। यह एक ऐसी व्यवस्था है, जो व्यक्ति को वास्तविक अर्थों में मानव बनाती है।

