छुट्टियाँ! अपने आप में यह शब्द उत्साह और रोमांच जागृत करने वाला शब्द है। शिक्षिका होने का कारण यह मेरे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं वरन् अह्लाद व उन्माद का सूचक है। ना बचपन में इस शब्द का महत्व कम था और ना आज।
अब तो जैसे ग्रीष्मावकाश तो दूर की बात है लगाती हुई दो-तीन दिन की छुट्टियाँ भी मिल जाए तो पंख लग जाते हैं। बचपन की बात कहूं तो यादों के मोतियों से बड़ी सुंदर माला बन सकती है। प्रधानाचार्य जी प्रार्थना सभा में गर्मी की छुट्टियों की घोषणा करते तो बाकी के बचे हुए दिन गिनने शुरू हो जाते थे। छुट्टी शुरू होने वाले के अंतिम दिन तो ऐसा लगता जैसे स्कूल किताबों से नहीं दुनिया के सारी बंदिशों से छुट्टी मिल गई हो। गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार मैं और मेरा भाई ऐसे करते थे जैसे कि किसी योजना को क्रियान्वित किया जाना हो।
स्कूल के आख़िरी कालांश की घंटी बजते ही लगता था जैसे किताबों से नहीं, पूरी दुनिया की बंदिशों से छुट्टी मिलने वाली हो। बैग कंधे पर होता और मन पहले ही बीकानेर के पास बसे नानी के गाँव कनासर की गलियों में दौड़ रहा होता। नानी का घर हमारे लिए सिर्फ एक घर नहीं था… वह हमारा छोटा-सा संसार था। गाँव की सीमा में प्रवेश करते ही शहर की तपती गर्मी जैसे पीछे छूट जाती। गर्म हवा के बीच भी गाँव की मिट्टी से उठती सौंधी खुशबू मन को अजीब-सी ठंडक देती थी।रास्ते के दोनों ओर खड़े नीम, बबूल, खेजड़ के पेड़, दूर तक फैली रेत हमें देखकर जैसे मुस्कुरा रहे होते। बस की खरड़-खरड़ आवाज़ और धूल भरी आंधी से लड़ते हुए हम पहुँच जाते थे – नानी के घर..!!
नानी का घर कच्ची-पक्की दीवारों वाला, चारों तरफ़ कमरे व रसोई और बीच में आँगन : सादा-सा घर था। आँगन में कदम रखते ही नानी की आवाज़ सुनाई देती— “ आ गए मेरे बच्चे ! मेरी लाडो!” उनके स्वर में इतना प्यार समाया होता था, उतना शायद पूरी दुनिया की किसी किताब में या किसी शब्दकोष में नहीं था। नानी के घर के पीछे एक बड़ा-सा जामुन का पेड़ था। उसकी ठंडी छाँव में हम घंटों बैठे रहते। छुप्पम – छुपाई, पैल – दूज़ खेलते रहते थे। जामुन तोड़ने के लिए कभी कोई लकड़ी ढूँढ कर लाई जाती तो कभी मेरा भाई पत्थर से निशाने लगाकर जामुन तोड़ने की कोशिश करता। नीचे गिरे जामुनों को अपनी हथेलियों और फ्रॉक में समेट लिया जाता फिर नानी से नमक लेकर वहीं बैठकर खाते थे। हमारी जीभ जामुनी हो जाती और नानी दूर से हमारी अठखेलियाँ देखकर हँसतीं रहती थी और कहती – “देखो तो, फ्रॉक भी जामुनी रंग ली, जीभ भी रंग ली : अब मुँह भी रंग लो !”
दोपहर में जब बीकानेर की धूप आग बरसाती, नानी हमें बाहर जाने से रोकतीं और कहती - “बहुत धूप है, अंदर आ जाओ। छाछ पी कर सो जाओ। “ हम कहाँ मानने वाले थे। नानी की आँख लगते ही खिसक लेते थे। तब धूप का कोई फर्क ना तन पर पड़ता था ना मन पर। चद्दर के घर बनाकर दोपहर कट जाती थी पता ही नहीं चलता था। नानी मिट्टी के घड़े से ठंडा पानी निकालतीं। वह पानी जैसे सीधे गले से उतरकर पूरे शरीर को ठंडा कर देता। फिर कभी आम का पन्ना बनता, कभी ठंडी लस्सी। शाम होते-होते गाँव की हवा बदल जाती। तपती दोपहर के बाद चलने वाली वह ठंडी हवा चेहरे को छूती तो लगता जैसे किसी ने प्यार से माथे पर हाथ रख दिया हो। नानी अपनी चारपाई आँगन में बिछा देतीं। हम सब उनके आसपास गोल घेरा बनाकर बैठ जाते।
आसमान शनै:-शनै: तारों को अपनी गोद में भरने लगता और नानी की कहानी शुरू हो जाती। मैं कहती – “नानी, आज वही राजकुमारी और जादूगर वाली कहानी सुनाओ।” मेरा भाई कहता- “नहीं, आज राजा वाली या भीमा पहलवान की ।” नानी हँसतीं— “अरे, एक दिन में कितनी कहानियाँ सुनोगे?” हम एक साथ कहते— “बहुत सारी!” फिर नानी अपनी धीमी, मीठी आवाज़ में रहस्यमयी तरीके से कहानी सुनाने लगतीं। कभी-कभी कहानी सुनाते-सुनाते उनकी आँखें कहीं दूर चली जातीं। शायद अपना ही बिता जीवन जी रही हो। हम कहाँ समझ पाते उनके नैनों की भाषा। एक रात मैंने उनका हाथ पकड़कर पूछा—“नानी, आप हमेशा हमारे साथ रहेंगी न?” उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुराकर कहा— “जहाँ बहुत सारा प्यार होता है न, वहाँ अपने लोग कभी दूर नहीं जाते।” उस समय उनकी बात समझ नहीं आई। छुट्टियाँ खत्म हुईं। स्कूल की घंटी फिर बजने लगी। हम शहर लौट आए।
नानी ने जाते समय हमारे बैग में अचार, पापड़, मंगोड़ी, जामुनों से भरी छोटी-सी पोटली और अपनी ढेर सारी दुआएँ रख दीं। हम बस की खिड़की से हाथ हिलाते रहे और नानी नम आँखों से सड़क के किनारे खड़ी रहीं। हमने सोचा—अगली गर्मियों में फिर आएँगे। अगली गर्मियाँ आई, छुट्टियां हुई । जब हम कनासर पहुँचे तो गाँव वही था। वही रेत, वही गलियाँ, वही जामुन का पेड़, वही आँगन… नाना, मामा- मामी सभी थे । बस जो नहीं था वो ….. नानी और नानी की आवाज़। दरवाज़ा खुला था। चारपाई वहीं पड़ी थी। उस पर नानी का तकिया रखा था।मैंने तकिया उठाकर सीने से लगा लिया।उसमें जैसे अब भी नानी की खुशबू बची थी। उस दिन पहली बार समझ आया कि कुछ लोग घर में रहते नहीं….. वे ही घर होते हैं। आज भी गर्मियों की छुट्टियाँ आती हैं।
कहीं दूर स्कूल की घंटी सुनाई देती है तो मन अचानक उसी गाँव की पगडंडी पर पहुँच जाता है। मुझे फिर वही ठंडी हवा महसूस होती है, जामुन के पेड़ की छाँव दिखाई देती है और मिट्टी की वह सौंधी खुशबू साँसों में भर जाती है। और लगता है, नानी अभी आँगन में बैठी होंगी। मैं आँखें बंद करके मन ही मन पूछती हूँ—“नानी… मैं आ गई।” और भीतर से जैसे वही आवाज़ आती है—“ आ गई मेरी लाडो!आ जा मेरे बच्चे… बहुत देर कर दी।” तब आँखों से आँसू चुपचाप बहने लगते हैं क्योंकि अब समझ आया है— बचपन की सबसे खूबसूरत गर्मियाँ; गर्मी की छुट्टियाँ नहीं थीं… वे नानी की गोद में बिताए हुए वे दिन थे, जिन्हें हम उस समय ‘जी’ रहे थे और आज उम्र भर ढूँढ़ रहे हैं।
कुछ लोग चले जाते हैं, कुछ घर सूने हो जाते हैं, लेकिन नानी के प्यार जैसी कुछ यादें कभी नहीं जातीं। वे हमारी यादों में जामुन के पेड़ की छाँव बनकर, मिट्टी की सौंधी खुशबू बनकर और किसी दूर आती घंटी की आवाज़ बनकर उम्र भर हमारे साथ रहते हैं।
अनुसूया मिश्रा

