Jadoo ki Jhappi: कभी-कभी एक छोटी-सी झप्पी भी जादू सा काम करती है। उस दिन के पहले ये बात बस मेरे लिए बस एक कहावत थी। उस वाकया के बाद मुझे महसूस कि एक झप्पी इंसान के मन-मस्तिष्क को एकदम हल्का कर सकती है।
शहर की भागदौड़ में उलझी मैं, उन दिनों दिन-रात काम में डूबी रहती थी। माँ का फोन आता, तो वह कह देती, “माँ, बाद में बात करती हूँ, अभी बहुत काम है।”
माँ हर बार मुस्कुराकर कह देतीं, “ठीक है बेटा, अपना ध्यान रखना।”
एक दिन ऑफिस में सब कुछ उल्टा हो गया। महीनों की मेहनत से तैयार किया गया प्रोजेक्ट अचानक रिजेक्ट हो गया। बॉस की डांट, सहकर्मियों की चुप्पी और खुद से नाराज़गी, सब मिलकर मुझे अंदर से तोड़ रहे थे।
शाम को जब मैं घर पहुँची, तो मन बिल्कुल खाली सा था। न रोने की और न किसी से बात करने की हिम्मत बची थी।
दरवाज़ा खोला, तो सामने माँ खड़ी थीं। बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए, उन्होंने मुझे अपने पास खींच लिया। मैं पहले तो चौंकी, फिर जैसे मेरी सारी थकान, सारी तकलीफ़ उस एक झप्पी में पिघलने लगी। मैं फूट-फूटकर रो पड़ी।
माँ ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बस इतना कहा, “चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा।”
उस पल ये एहसास हुआ कि कभी-कभी शब्दों की ज़रूरत ही नहीं होती। एक सच्ची झप्पी दिल की हर दरार को भर सकती है। वह झप्पी सिर्फ सांत्वना नहीं थी, वह विश्वास था कि चाहे दुनिया कितनी भी कठोर क्यों न हो जाए, एक जगह ऐसी है जहाँ सब कुछ नरम हो जाता है और वह है माँ की झप्पी।
अगले दिन मैंने खुद को थोड़ा हल्का महसूस किया। मैंने फिर से काम शुरू किया, इस बार मेरे अंदर एक नया जुनून था.. एक सुकून था। मैंने समझ लिया था कि असफलता अंत नहीं है और हर गिरावट के बाद उठने की ताकत कहीं न कहीं मिल ही जाती है.. कभी अपने अंदर से, तो कभी किसी अपने की बाँहों से।
उस दिन के बाद मैंने माँ के फोन को कभी नहीं टाला और जब भी जिंदगी मुश्किल लगती, उस दिन वाली मीठी सी झप्पी को याद करती और अपनी टूटती हिम्मत को बूस्ट करने की कोशिश कर लेती।
सच ही कहा गया है, कभी-कभी एक छोटी-सी झप्पी भी जीवन का सबसे बड़ा जादू बन जाती है।
मीनाक्षी सिंह

