Hindi Short Story: बचपन की वह शरारत, जो आज भी चेहरे पर मुस्कान ले आती है। बात उन दिनों की है ,जब मैं महज 8 साल की थी। गर्मी की छुट्टी आते ही हमें नानी के घर जाने का इंतजार रहता था।मेरी नानी का घर कलकत्ते में था।
मेन रोड पर उनकी पुरानी बिल्डिंग खड़ी थी। मेरी नानी के घर के नीचे नानाजी की हलवाई की दुकान थी।जहां नाना जी बैठते थे। सुबह होते ही गरम समोसे की खुशबू पूरे माहौल में फैल जाती थी।
उस जमाने में आज की तरह हर घर में फ्रिज नहीं हुआ करता था,और उन समोसे में भरने के लिए आलू को रोज रात को उबालकर बाहर बरामदे में ठंडा करने के लिए रखा जाता था। बस यही आलू एक दिन हमारे लिए खेल का सामान बन गए। बरामदे के बाहर में मेंन रोड पर गाड़ियां फर्राटे से दौड़ती नजर आती थी। उस समय कलकत्ते में फरारी गाड़ी का बड़ा चलन था।हम सभी बच्चे रोज उस बरामदे में जाते ,और एक-एक आलू उठाकर बाहर रोड पर फेंकते थे।
जिस बच्चे का आलू, फरारी गाड़ी के नीचे मसला जाता था। वह बच्चा विजेता कहलाता था। रोज सुबह हम उठकर यही काम करते थे। नानाजी सुबह जब आलू लेने के लिए आते तो मन ही मन बुदबुदाते थे कि मैंने तो रात को चार भगोने में आलू उबालकर रखे थे, यह इतने कम कैसे हो गए। तब हम सब बच्चे एक दूसरे का चेहरा देखकर दबी हंसी हंसते थे।एक दिन नानाजी अपनी दुकान से बाहर निकले ,तो उन्होंने बाहर रोड पर कई उबले आलू पड़े हुए देखें ,उन्हें लगा किसी और ने फेके होंगे, उन्होंने इस बात पर इतना ध्यान नहीं दिया, पर रोज जब भागोने में आलू कम दिखाई देने लगे, तब उन्होंने नानी से कहा कि मैं रोज रात को चार भगोने आलू उबालकर बाहर बरामदे में रखता हूं और उसमें से आलू बहुत कम हो जाते हैं।
मुझे दो-तीन दिन से बाहर रोड पर आलू पड़े दिखाई देते हैं ,पता नहीं कौन, फेंक देता है ,इन आलूओं को। तब नानी ने नानाजी से कहा, कि मैं ध्यान रखूंगी कि कौन आलू फेकता है। हम सब बच्चों को यह बात पता चल गई थी कि, नानी उबले आलू का अब ध्यान रखती है, इसलिए हमने समय बदल लिया था।पर हम भूल गए थे की नानी की नजर से कौन बच सकता हैं। एक दिन नानी ने हमें रंगे हाथ पकड़ लिया, और हम सभी को इतनी डांट पड़ी कि आज भी सोच कर हंसी आती है हमने कसम खाई कि अब हम कभी भी आलू, बाहर रोड पर नहीं फेकेंगे।
समय बीत गया ।बचपन छूट गया ,शायद नानी का घर और बरामदा पहले जैसा ना रहा, पर वह शरारत आज भी मैं भूल नहीं पाती।आज भी वह बरामदा और घर मेरी यादों में ताजा है। आज जब किसी भी छोटे बच्चे को मैं आलू से खेलते हुए देखती हूं, तो मुझे अपना वही पुराना बचपन याद आ जाता है।
वह नानी का घर ,वह पुराना बरामदा, नानाजी के दुकान की हलवाई की खुशबू सड़कों पर दौड़ते हुए फर्राटे से गाड़ियां के बीच हमारा अनोखा खेल हमें याद आता है। बचपन की यही खूबसूरती होती है शरारते छोटी होती है, पर उनकी यादें जीवन भर साथ रहती है।
वह पुराना बरामदा आज भी मेरी यादों में बसा है ,जहां कभी नन्हे बच्चे खड़े होकर अपने अपने आलू को सड़क पर फेंक कर चिल्लाया करते थे, मैं जीत गया और शायद सच में जीत हमारी ही हुई थी, क्योंकि हमने बचपन की ऐसी यादें जीत ली थी, जिसे आज तक कोई भी हमसे छीन नहीं पाया ।
- नीता गुप्ता

