Hindi Short Story:गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही घर जैसे अचानक ज़िंदा हो उठा था। शहर से बेटा, बहू और उनका दस साल का बेटा आरव गाँव आए थे।
बस से उतरते ही आरव ने अपना बैग आँगन में फेंका और दादा के पास दौड़कर बोला— 'दादाजी!
अब पूरे एक महीने की छुट्टी है… मैं खूब खेलूँगा।”
दादा ने उसके सिर पर हाथ फेरा और मुस्कुरा दिए। “हाँ बेटा, खूब खेलना… छुट्टियाँ खेलने के लिए ही तो होती हैं।” अगली सुबह आरव आँगन में मिट्टी से खेल रहा था। कभी मिट्टी का घर बनाता, कभी छोटी-सी नहर बनाकर उसमें पानी बहाता। उसके कपड़े मिट्टी से सन गए थे। बहू ने दूर से देखा तो बोली, “आरव! ये क्या हाल बना रखा है? अभी तो नए कपड़े पहनाए थे।”
दादा हँस पड़े।
“बहू, रहने दो… मिट्टी से कपड़े गंदे होते हैं, बचपन नहीं।” आरव दौड़कर दादा के पास आ गया। “दादाजी, आप भी मिट्टी में खेलते थे?” दादा कुछ पल चुप रहे। फिर उनकी आँखों में जैसे कोई बहुत पुराना गाँव उतर आया। “हम? हम तो दिनभर मिट्टी में ही पड़े रहते थे।” “सच?” “हाँ। हमारे पास ये खिलौने कहाँ थे? मिट्टी से बैलगाड़ी बनाते, लकड़ी की तलवार बनाते और कभी-कभी तो खेत की मेड़ पर घंटों दौड़ते रहते।” आरव बड़े ध्यान से सुनने लगा।
दादा ने आँगन के कोने में पड़े पुराने घड़े की ओर देखा और बोले— “और पानी चाहिए होता था तो कुएँ पर जाते थे।” “कुएँ पर? पानी लेने?” “हाँ। तुम्हारी तरह नल खोलकर पानी नहीं आता था हमारे घर। रस्सी डालकर बाल्टी खींचनी पड़ती थी।” आरव की आँखें चमक उठीं। “आप बाल्टी खुद खींचते थे?” दादा हँस दिए। “हम तो कुएँ से पानी खींचते-खींचते बड़े हुए हैं। कभी बाल्टी भारी हो जाती तो चार दोस्त मिलकर रस्सी खींचते थे।” फिर दादा जैसे अपने ही बचपन से बातें करने लगे।
“गर्मी की छुट्टियाँ आती थीं तो सुबह होते ही घर से निकल जाते। माँ पीछे से आवाज़ लगाती रहती—‘दोपहर हो गई, घर आ जा।’ लेकिन हमें कहाँ सुनाई देती थी उनकी आवाज़! कभी आम के पेड़ पर चढ़े हैं, कभी तालाब के किनारे बैठे हैं, कभी खेतों में दौड़ रहे हैं। दोपहर में जब धूप बहुत तेज़ हो जाती तो किसी पेड़ की छाँव में लेट जाते। किसी के पास रोटी होती तो सब मिलकर खाते। न कोई मोबाइल था, न टीवी… फिर भी पता नहीं क्यों, उस समय दिन बहुत छोटे लगते थे।”
आरव चुपचाप दादा का चेहरा देख रहा था। “दादाजी… आपको अपना बचपन याद आता है?” दादा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा— “बचपन कहाँ जाता है बेटा… बस हम बड़े हो जाते हैं।” कुछ देर दोनों चुप रहे। आरव ने मिट्टी से बना अपना छोटा-सा घर दादा के सामने रखा। “दादाजी, ये आपके लिए है।” दादा ने उस मिट्टी के घर को दोनों हाथों से उठाया। आँखों में नमी थी। उन्हें लगा जैसे आरव ने मिट्टी का घर नहीं, उनका पूरा बचपन उनके हाथों में रख दिया हो।
शाम को आरव ने पूछा— “दादाजी, कल कुएँ पर चलेंगे?” दादा मुस्कुराए। “चलेंगे बेटा… तुम्हें पानी खींचना सिखाऊँगा।” आरव खुशी से उछल पड़ा। और दादा देर तक उसे देखते रहे। उन्हें लगा— छुट्टी सिर्फ़ आरव की नहीं हुई थी। कई बरस बाद उनके भीतर भी बचपन ने छुट्टी ले ली थी… और वह मिट्टी में खेलता हुआ फिर से उनके पास लौट आया था।
- डॉली अग्रवाल

